लाखो के भीड़ में मैं अकेला,
माँ के सम्मान में कैसा झमेला।
ऑनलाइन लाइन की दुनिया है,
राष्ट्र भक्ति भी अब मजबूरिया है।
प्रश्न मेरे मन में है उठाता,
स्वतंत्रता आयी ये सोचता।
क्या स्वतन्त्र है हम ये सच है,
जीवन में कितना मच मच है।
गरीब गरीब हो रहा ये सच है।
आमिर अपने आमिरी में मस्त है।
नौकर शाहो को नौकरी की है चिंता,
गरीब की रोटी हर कोई है छिनता।
कपड़ो का अम्बार लगा,
गरीब नंगे बदन पला।
भारत अन्न का भंडार,
किसान क्यों है बदहाल।
तकनीक का जमाना है आया,
भूखों को न मिलता है खाना।
एक प्रश्न फिर से उठता है,
मेरे अंतस को नोचता है।
क्या मैं स्वतन्त्र हूँ,
या फिर परतंत्र हूँ।
जो है स्वतंत्र उनको बधाई,
पर जारी रहेगी मेरी लड़ाई।
पैसो का है बोल बाला,
गांधी को भी नोच डाला।
भाग दौड़ की कैसी जिन्दगी,
धन दौलत की करते बंदगी।
सवाल मेरा अब भी खड़ा,
मेरे आगे आके अडा।
क्या मैं स्वतन्त्र हूँ❓❓
जो स्वतन्त्र है उनको बधाई,
मेरी तो जारी है लड़ाई।
मन में जिनके प्रश्न अनेक,
चल मेरे साथ घुटने न टेक...
✒लोकनाथ सेन "अनपढ़"
अमेरा, बलौदा बाजार
मो 9977580623
ब्लॉग आर्काइव
सोमवार, 25 जनवरी 2016
क्या मैं स्वतन्त्र हूँ ??
गणतंत्रता दिवस की सुभकामनाएॅं...
जरा अपनी आँखों को पोंछ ।
दुश्मन में क्या दम था ?
क्या हर हिंदुस्तानी कम था ?
आजाद भारत के हम है वासी,
कैसे बने स्वतन्त्र निवासी ।
भारत में क्यों स्वतंत्रता थी आई,
छुपी हुयी थी सबकी भलाई
कैसे और किसने है लाई ?
सन् सन्तावन की लड़ाई,
हम न भूल पाये हैं भाई ।
किसने लूटी थी लाज,
मैं अनपड़ बताऊ आज ।
सन्तावन की चिंगारी जलाये रखा,
असर सैतालिस में जाके दिखा ।
दुश्मन में न दम था,
लड़ने वाला अपना हमदम था ।
अपनों ने खंजर खोंपा था,
गुलामी को हम पर थोपा था ।।
आजादी की जो चिंगारी थी,
हमको प्राणों से प्यारी थी ।
भारत के सहस्त्र सपूतों ने,
माँ भारती के पुतों ने ।
कितनों ने थी खून बहाई,
अंग्रेजों से हुयी लड़ाई ।
हिंसा और अहिंसा की,
वो बेजोड़ कहानी थी ।
लड़कर मरने वाली हर नारी,
माँ भारती की बेटी मर्दानी ।
दोलन पर आंदोलन था,
रक्त तब अनमोल न था ।
इतिहास की वो कहानी थी,
कुर्बान लाखों जवानी थी ।
हिंदी, हिन्दू, हिन्दुस्तान,
कैसे बन गया पाकिस्तान ।
फुट डाला शासन किया,
हर भारत वासी का खून पिया ।
सहन शक्ति जब अंत हुआ,
अत्याचार का तब अंत हुआ ।
डर कर कायर भांगे थर-थर,
वर्ना जाते कंधो पर चढ़कर ।
देव संस्कृति की सभ्यता क्यों हारी,
जाने जग और अम्बर सारी ।
क्या दुश्मन वो चला गया,
क्या मुश्किल वो टल गया ।
फिर लूटेगा, फिर फूटेगा,
स्वतंत्रता का भ्रम टूटेगा ।
अत्याचारी सिने पर बैठ गया,
घर घर में घूसकर लेट गया ।
अब भी क्या हम चुप बैठेंगे,
माँ का लूटता श्रृंगार देखेंगे ।
बेकार हमारी जवानी है,
हम से तो खूब कहानी ।
पहले वो व्यापारी था,
पर मन से अत्याचारी था।
अब बन गया है मेहमान,
पुरे कर रहा अपने अरमान।
पहले लूटा बल के दम पर,
अब लूट रहे तानाशाही जमकर।
दुश्मन घर घूस आया है आज,
माँ भारती की बचालो लाज ।
भाई-भाई को काट रहा है,
माता को टुकड़ो में बाँट रहा है ।
लूट रही भारत की नारी,
पश्चिमी सभ्यता है हमको प्यारी ।
अनपढ़ हूँ मैं अज्ञान नहीं,
बेकार किसी का बलिदान नहीं ।
आवो मिलकर साथ चले,
हम भी तो इतिहास लिखे ।
सभी भारत वासी को गणतंत्रता दिवस
की हार्दिक सुभकामनाएॅं...
! वन्दे मातरम !
लोकनाथ सेन ‘‘अनपढ़’’
अमेराए बलौदा बाजार
मो न 9977580623
स्वतंत्रता की अलख जगाई,
मातृभूमि के लिए लड़ाई।
वो जग कैसे छूट गया,
देश मेरा क्यों टूट गया।
तुष्टिकरण की निति है लाई,
जग सत्ता और खुद की भलाई।
अपनों अपनों में हुयी लड़ाई,
सपूतो को मिली तन्हाई।
गुमनाम सी जिंदगी,
मातृभूमि की बंदगी।
ले चला था वो डगर में
राष्ट्र की डूबती नइया पार,
डूब गया वो बिच मझधार।
गुमनाम जिसकी जिंदगी,
बदनाम जिसकी कर दी हस्ती।
राजनीती का दुर्बल अखाडा,
था जिसने हर दम ललकारा।
सत्ता के भूखे थे जितने,
अपने साधने थे निकले।
जग हम पर अब हांस रहा,
देशद्रोही ताण्डव नाच रहा।
⛳
आजाद हिन्द के सिपाही
अमर शहीद
नेता जी सुभाष चंद्र बोस जयंती पर भावपूर्ण वंदन।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
अमेरा बलौदा बाजार
मो 9977580623
देख गुलामी की जंजीरे
माता कभी रोई थी।
न जाने कितने रातो से,
वो चैन से नहीं सोई थी।
बेटे के तन पे कपड़ा हो,
माता की यही अभिलाषा थी,
माता ठण्ड से सिकुड़ रही थी।
बेटा सोया है आराम से,
बस इतना ही दिलाशा थी।
जब स्वतन्त्र हो जाउंगी मैं,
बेटा मेरी मान बढ़ाएगा,
चैन से अपनी गोदी में,
मुझको वो सुलयेगा।
माता कहके मुझे तब बेटा,
अपने गले गलयेगा।
माता नहीं अमाता,
पुत्र कैसे कुपुत्र हुआ।
माता रोई है जनम जनम,
बेटा अब भी चैन से सोया।
माता अब भी करे जगराता,
बेटे को पर सरम न आता।
भुला वो माता का प्यार,
भारी पड़ा बीवी का दिन चार।
★अनपढ़
लोकनाथ सेन
मंगलवार, 19 जनवरी 2016
राहे जिंदगी,
आसान है होती,
राहों पे सोती।
बिखरे फूल,
खाते राहों के धूल,
क्या है उसूल।
कोमल तन,
है बिखरे रतन
मासूम मन।
जब तन्हाई,
राहों में खूब रोती
तरक्की होती।
है तड़पती,
जब मासूमियत,
बदनीयत।
जड़े नक्सल,
कहते पल पल,
वापस चल।
मन चंचल,
इतना न मचल,
जरा सम्हल।
नारी अबला,
हो गयी है सबला,
कायर चला।
मासूम मन,
लूट रहा है तन,
कर मंथन।
मैं अनपढ़
करता बड़बड़,
कविता गढ़।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
9977580623
अमेरा, बलौदा बाजार
KCP amera - ACRR
सोमवार, 18 जनवरी 2016
कविताओ के गागर में,
डूब ले इस भवसागर में।
जिन्दा रहना चाहता कौन है,
इस जमाने में,
जिन्दा रहने के लिए लोग जाते है,
मयखाने में ।
जादू नहीं शराब है,
जमाना कहता है खराब हैं।
कुछ को ये चिंता सताती है,
उनकी कविता बताती है,
चोरी से घबराती है।
हो जायेगी कविता चोरी,
इतनी छोटी है कमजोरी।
कौन चुरा ले जायेगा,
वो भाव कहा से लाएगा।
शब्दों को हेर फेर कर,
एक नयी कविता बनाएगा।
पर कविता में छुपे,
मेरे दर्द को कहा से पाएगा।
दुनिया में छाएगा,
पर जो टुटा दिल है मेरा,
वो टुटा दिल कहा से लाएगा।
जग देख रहा है हरपल,
सरेख रहा है कलकल।
वो एक कविता चुराएगा,
मैं दस कविता बनाऊंगा ।
वो दस कविता चुराएगा,
मैं सौ शब्द ले आऊंगा।
शब्दों के सागर में जाऊंगा,
एक मटका भर कर लाऊंगा।
कविता दिल से बनाउंगा,
गीत बना के गाऊंगा।
जमाना तरसता रहता है,
अनपढ़ बरसता रहता है।
मेरी कविताओ की बोली,
नहीं हंसी ठिठोली।
जो न मिला कन्धा किसी का,
अकेले में चुपचाप है रोली।
सबके सर चढ़कर है बोली,
अनपढ़ की कविता की झोली।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
9977580623
अमेरा, बलौदा बाजार
KCP amera:ACRR
रविवार, 17 जनवरी 2016
अनपढ़ की रानी।
सुन्दर रूप मनमोहनी,
दिल की बगिया की सोहनी।
देख तुझे मेरा मन बोला,
डूब नयनो में अनपढ़ भी डोला।
बला की खूबसूरत है तू,
सुनंदरता की मूरत है तू।
न जाने क्या चमत्कार,
देख तुझे भुला घर बार।
सुंदर काले घन केश,
मन भावन तेरा है भेश।
बैठा अनपढ़ सोंच रहा,
बालो को अपने नोच रहा।
सुन्दर तेरे कटीले नैन,
रहता हर पल मन बेचैन।
सुन्दरता की मूरत है तू,
मेरे सपनो की सूरत है तू।
बनाया खुदा ने तूझे नाजो से,
सजाया मेरे अरमानो से।
होठो की तेरी मुस्कान,
पहुचाये कइयों को समसान।
दर्शन तेरा मिला है मुझको,
लाखो दूवाये है तुझको।
ना रख कदमो को जमी पर रानी,
तेरी मेरी एक कहानी।
देख मोहब्बत जग रूठा,
मेरा तो था किस्मत फुटा।
तन्हाई में मैं बैठा,
ले के दिल अपना टूटा।
रूप की तू रानी थी,
जग से बड़ी सयानी थी।
कहानी तो पुरानी थी,
पर सबको हैरानी थी।
सबको तो परेसानी थी,
सच तो अनपढ़ की रानी।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
अमेरा, बलौदा बाजार
KCP amra- ACRR
गया था मैं एक शादी में,
एक मासूम की बर्बादी में ।
खड़ा खड़ा मैं सोच रहा था,
समधी समधी को नोच रहा था।
नेताओ का ये बंधन है,
शासन का आबंटन है।
कहते है दुनिया बदल गयी है,
महिलाओ के गालो में बालो की लड़ी है।
महंगाई बढ़ गयी है,
चेहरे पे पाउडर लिपस्टिक और मेकअप चढ़ गयी है।
बफर में खाना बंट रहा है,
भूखा भूख पट रहा है।
देश में बड़ी गरीबी है,
डस्टबिन में पड़ी मजबूरी है।
रोटी का टुकड़ा फेक दिया,
गरीब की गरीबी को भी बेंच दिया।
पैर छूने का आया रिवाज,
पैर न छुए तो नेता जी नाराज।
बोझ बन गये है माँ बाप,
पैर तले रौंदते है लाज।
किस्मत तेरा रूठ जायेगा,
अपनों का साथ छूट जायेगा।
रो रो कर तू करे पुकार,
सुना जीवन है बेकार।
जीवन तू क्या जी पाये
अकेले तो जी घबराये।
सबको अपना मान ले,
जग है तेरा जान ले।
सुभ रात्रि
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
पढ़ा लिखा जो होता है,
खुद में वो खोता है।
मनगढ़ हु अनपढ़ हूँ,
सबसे सिख रहा हूँ।
कविताओ के भव सागर
तैरते दिख रहा हूँ।
ज्ञान का मसाल नहीं,
अज्ञान ही पहचान सही।
मैं नहीं कोई साहित्यकार,
फिर भी रहा जग को ललकार।
एक छोटा सा कलमकार,
बुराइयो को मैं रहा धिक्कार।
मचा जग में है घमासान,
हर जगह दीखते है शमसान।
जनता करती त्राहि माम,
मानवता का काम तमाम ।
देख के मेरा मन भी रोता है,
दीन रात नहीं ये सोता है।
खुस हु कि मैं अनपढ़ हूँ,
कहने को तो मनगढ़ हूँ।
मैं जग की सेवा कर,
ध्यान नहीं है मेवा पर।
सीधा और सादा सही,
जीवन भर आधा सही।
अपने सुखकी कामना,
दुःख की गठरी न बांधना ।
किसी से नहीं हो सामान,
आशीष मिले यह कामना।
शुभ दोपहरिया
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
अमेरा, बलौदा बाजार
9977580623
ब्लॉग
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(KCP Amera: all copy right reserved )
शनिवार, 16 जनवरी 2016
लिखना एक कला है,
सुंदरता बला है।
लिखके मैं बिक गया,
सुंदरता छुप गया।
क्यों है इतनी खामोशी,
जीवन में मदहोशी।
ले चला मैं खुद की नैया,
काँटों भरी है जीवन शैया।
बदल रहा है जग में मानव,
पग पग में मिलते है दानव।
जिंदगी अब भी भारी है,
इंसानियत अब बीमारी है।
बने है पक्ष विपक्ष,
क्यों नहीं कोई मानवता के समकक्ष।
रक्षक कौन मै सोंच रहा,
भक्षक मासूमियत नोच रहा।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
जीवन पथ में बढ़ रहा था,
खुद से मैं तो लड़ रहा था,
जमाने में कोई संग नहीं था,
खुसिया थी कोई गम नहीं था,
अपने पराये जो भी आये,
मैंने तो बस सब गले लगाये,
राह आसान अब बन पाये,
पराये अपने बन जाये,
देख जमाने की राह,
निकल रही थी आह।
दोस्त दुश्मन की क्या पहचान,
लोग करते है अपनों का अपमान।
सुभरात्रि
अनपढ़
लोकनाथ सेन
शुक्रवार, 15 जनवरी 2016
तुझे याद करते हुए सारी रात बैठा था,
याद नहीं की जागा था या सोया था ।
तश्वीर तेरी आँखों में छप गयी है,
याद रहति दिन रात तू वही है।
जीवन जीना भूल गया मैं,
जब से तेरा दीदार किया मैं ।
सुबह हुयी तो उठ गया,
लोगों ने बताया लूट गया।
सारी रात सीने से तश्वीर तेरा लगा रखा था,
तश्वीर में उस नाम तेरा माँ भारती लिखा रखा था।
शुभ प्रभात
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
चेहरे की तेरी मुस्कान
कर देती है हैरान,
पागल बना तेरी एक नजर का,
अब तो बस इंतजार है कबर का।
आशिकी में लोग आफत कर देते है,
पर लोग हमारी सराफत का मिसाल देतें है।
वो हलकी सी तेरे चेहरे की मुस्कान,
आज भी बैठे है हम सीना तान।
जुनून था इश्क का तेरा दीदार हो जाये,
हम तो बैठे है की एक बार फिर से प्यार हो जाये,
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
शुभ रात्रि
क्या मैं नहीं जिम्मेदार ?
भाई भाई की टांग खिंच रहा,
पडोसी आँखे मिंज रहा ।
अपना पराया समझ न आया,
अपनों को दुःख पहुचाया।
टाई गले में खोंच रहा,
अपनों को ही नोच रहा।
टुकड़ो में बटा घरबार,
हस रहा जग संसार।
घर घर में झगड़े,
बढ़ रहे है लफड़े ।
बेटी की है चाह,
बेटा है गुमराह।
घर द्वार को छोड़ रहा,
उम्मीदों को तोड रहा।
बेटे की क्या गलती,
बहु नहीं है अपनी।
जिम्मेदारी से भागा,
बेटा बना अभागा।
कितनी जिम्मेदारी,
क्या थी होशियारी।
टुटा जो परिवार,
सुधर गया संसार।
घर पहली पाठशाला,
बन गया मधुशाला।
बदल गए है संस्कार,
घर घर होते अत्याचार।
बेटी का हुआ बलात्कार,
परिवार खड़ा लाचार ।
विधि का कैसा विधान,
भारत का संविधान ।
परिस्कृत हुआ सम्मान,
नेता का अभिमान।
धन का बढ़ा मान,
अधिकारी बेईमान।
मजाक बना कानून,
मानवता का हुआ खून।
तन्हा बैठ मैं भी सोचु,
कितनो की आँखे पोछू।
बढ़ रहा है हाहाकार,
क्या मैं नहीं जिम्मेदार।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
बलौदाबाजार
9977580623
(All copy right reserved :KCP)
ब्लॉग www.anpadhkavi.blogspot.com
गुरुवार, 14 जनवरी 2016
स्वच्छ भारत अभियान
स्वच्छ भारत
अभियान ।
गांव गली अउ
खोर हे सुनसान।
मंत्री संत्री,
सबो करे बखान।
मोदी जी के
करे जम्मो
गुन गान।
गली खोर
अ-स्वच्छ् होंगे,
मंत्री संत्री,
मगरमच्छ होंगे।
कचरा होंगे
पूरा साफ,
नेता जी के
जम्मो गलती माफ़।
फोटो खिंचागे,
पैसा सिरागे,
कन्हिया पिरागे।
स्वच्छता,
आवय चाहे,
झन आवे,
मंत्री जी
बनेच मोटागे।
फोटो खिंचाइस,
टीवी में आईस,
पेपर में
तको छपवाईस,
फेर स्वच्छता,
कहा आईस।
डस्टबीन के,
कचरा ला
थोकन बने बगरा,
सूट बूट में,
झाड़ू धरके,
फोटो खिंचवा,
व्हाट्सएप्प,
फेसबुक
अउ ट्विटर
में बगरा,
मोदी जी के
नजर में आ।
गरीब रोवथे,
बइठ के सोचथे,
खाय बर
दाना नई हे,
स्वच्छता कोन डाहर
आवत हे।
बने दिन
ल सोरीयावत हे,
गरीब हाडा अस,
सुखावत हे,
अमीर भैसा अस,
मोटावथे।
रेडियो बड़,
नारियावत हे,
मोर बने दिन,
कोन डाहर ले,
आवत हे।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
बुधवार, 13 जनवरी 2016
सर्व शिक्षा अभियान
सर्व शिक्षा
अभियान,
झन कर अतका
अभिमान।
लेगाबो तोला,
शमशान।
तोर दया कृपा ले,
रोये लइका
अउ सियान।
शिक्षा के दुर्गति,
तोर कृपा हे अति।
मध्यान्ह भोजन
खवाये,
लइका ल अबड़,
खेलाये।
भवन सेप्टिक
सब्बो बनाये,
लइका मन ल
पढ़े लिखे
अनपढ़ बनाये।
न शिक्षा के पता,
न शिक्षक के पता,
चल चला
पोर्टफोलियो बना।
किसम किसम
के दिन गिनाए,
दाई दादा के,
मन भरमाये।
अधिकारी मन,
दबाके कमाए।
पैसा मिलिस पोठ,
अधिकारी मन के,
बडे बड़े गोठ।
शिक्षक मन ला,
डंडा परिस,
रोठ रोठ।
पढ़ाये ल भुलागे,
साग ल सुधारे,
वेतन बर
गली गली
छुछुवारे।
स्कूल ले बने,
शमशान हे,
पढ़े के लइक
उही बने
सुनसान हे।
जेन ल देखबे
तेन स्कूल में
आवत हे।
गुरूजी जी ल
चमकावत हे।
लईका मन
तको गुरूजी ल
डरवावत हे।
अंगूठा छाप नेता,
पढ़े लिखे गुरूजी ल
समझावत हे।
ले ग अब हमरो
बने दिन आवत हे।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
मंगलवार, 12 जनवरी 2016
जोकर...
कवि मैं नहीं,
न मैं साहित्यकार ।
न जानू मैं
साहित्य का झंकार ।
मैं तो बस,
कागज एक कोरा।
भूखे के सामने,
रखा खाली कटोरा।
अधजल गगरी,
सारे जहां में पसरी ।
छलकत जाये,
जहा जहा से गुजरी।
साहित्य से अज्ञान,
शब्दों से परेसान।
न जाने क्या है,
छंद, रस और अलंकार।
न मुझमें,
तनिक भर अहंकार ।
मै तो हूँ,
कवीता में लोफर,
जैसे तास में,
रहता है जोकर।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
कविताये गढ़ रहे ह
कविताये गढ़ रहे है,
कवि लड़ रहे है ।
किस बात की ये है लड़ाई,
वर्चश्व कहा से आई ।
साहित्य की मधुर बेला,
किसने अहम् को धकेला ।
मैं की ले दूहाई,
लड़ रहे हैं भाई भाई।
साहित्य एक बंधन है,
क्या ये रिस्तो से कम है।
अकेला अनजान चल रहा था,
बिन नीव के महल गढ रहा था।
साथ मिला संताप मिला,
कवियों का आशीर्वाद मिला।
मुझ अनपढ़ अज्ञान को,
शब्दों का दान मिला।
शब्द जो मेरे थे कोरे,
अब भी कुछ हैं अधूरे ।
साथ कब विपरीत धुरे,
होंगे कविता कब मेरे पुरे।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
साक्षर त होवथे
दू ठन कुरिया,
स्कूल हे दुरिहा।
भात मिलथे पूरा,
शिक्षा हे अधूरा ।
गुरुजी कब पढ़ाथे,
दार भात खवाथे।
स्कूल के हाल बेहाल,
शिक्षा हे बदहाल ।
गुणवत्ता के नाम दिस,
आनी बानी दिन गिनिश्।
डाक ल बनइस,
गुरूजी कहां पढ़ईस।
पहाड़ा ल रट,
पाठ सफाचट।
गाना ल गवइस,
शिक्षा ल भूलइस।
जनगणना करिस,
लइका ल नई चिन्हीस।
गली गली ल घुमिस्,
स्कूल ल भूलिस।
शिक्षा बदहाल हे,
अधिकारी मालामाल हे,
गुरूजी कंगाल हे,
शासन के कमाल हे।
शिक्षा ल भुलागे,
पढ़े के दिन मुंदागे,
पास फैल नंदागे,
दाई ददा के बया भुलागे।
नवा तरीका ले पढ़ा,
गुरुजी तको अब अड़हा,
पढ़ा चाहे झन पढ़ा,
लइका ल आगू बढ़ा।
वेतन झन मांग,
झोला ल टांग,
गली ल लाँघ,
गुरूजी तको उटपटांग।
लइका पास होवथे,
गुरूजी रोवथे,
दाई ददा सोचथे,
शासन कथे,
अरे साक्षर त होवथे।
✒ अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
सोमवार, 11 जनवरी 2016
कवि का दर्द
कविताये गढ़ रहे है,
कवि लड़ रहे है ।
किस बात की ये है लड़ाई,
वर्चश्व कहा से आई ।
साहित्य की मधुर बेला,
किसने अहम् को धकेला ।
मैं की ले दूहाई,
लड़ रहे हैं भाई भाई।
साहित्य एक बंधन है,
क्या ये रिस्तो से कम है।
अकेला अनजान चल रहा था,
बिन नीव के महल गढ रहा था।
साथ मिला संताप मिला,
कवियों का आशीर्वाद मिला।
मुझ अनपढ़ अज्ञान को,
शब्दों का दान मिला।
शब्द जो मेरे थे कोरे,
अब भी कुछ हैं अधूरे ।
साथ कब विपरीत धुरे,
होंगे कविता कब मेरे पुरे।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
छमताओ को जानकर हमने,
छमताओ को जानकर हमने,
अपना कदम बढ़ाया है।
इतिहास हवाह है,
इतिहास ने इतिहास को,
हर बार दोहराया है ।
सम्मान क्या अपमान क्या,
क्या मैंने साथ लाया ।
जो भी है मेरे पास,
आप सभी से है मैंने पाया ।
कुछ भी नहीं है मेरा अपना,
फिर क्यों मेरा मेरा रटना।
समाज में पाये सम्मान समर्पण,
क्या मेरा जिसे न कर सकु अर्पण।
सारे जहाँ में फैला घर्षण,
समाज है सबका दर्पण।
कई बार गया मै हार,
फिर से खड़ा हुआ हरबार।
स्वतंत्र रहा है मेरा विचार,
अभिव्यक्ति है मेरा अधिकार।
झुका नहीं कभी डरा नहीं,
हार कर भी कभी हारा नही।
शिक्षा को समर्पित मेरा तन मन,
समाज को अर्पित सारा जीवन।
सपना किसी का तोडा नहीं,
जीवन में मेरे कोई रोड़ा नहीं।
काठीनाइ आते है आये,
उनसे भी दो दो हाथ हो जाये।
मातृ भूमि का कर्ज चुकाने,
माँ की सेवा में शीश कटाने।
✒अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
अमेरा, बलौदा बाजार
मो 9977580623
शुक्रवार, 8 जनवरी 2016
जीवन दौड़
जीवन एक दौड़ है,
पढना इसका आरम्भ ।
पढ़ लिखके क्या बनोगे,
अच्छी नौकरी करोगे ।
नौकरी मिली अब बोलो,
शादी के लिए घूँघट खोलो।
विवाह हुआ अब बच्चों की बारी,
नर्सरी भेजु या आँगन बाडी।
पढ़ लिखकर हुआ बड़ा,
नौकरी की आस लगाये खड़ा।
अधिकारी को घुस खिलाओ,
बेटे की नौकरी लागाओ।
लाखो का दहेज़ जमाओ,
सुंदर शुशील दामाद पाओ।
बुढ़ापे का एक सहारा,
कौन बनेगा अब तूम्हारा ।
बेटी चली ससुराल हुयी परायी,
बीटा भुला जब से बिवीई घर आई।
अब बोलो क्या तुमने पाया,
जीवन भर जो भागम भाग मचाया।
बुढ़ापे का कौन सहारा,
ढाई गज जमीन ही मिल पाया।
✒ अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
अटल मन
कवि संगती,
होती बड़ी दुर्गति,
कवि की माया,
अनपढ़ थर्राया,
मन में घबराया।
शब्दों के बाण,
लगते जैसे त्राण।
मन को मोहे,
शब्दों को नित जोहे,
छंद सोरठा दोहे ।
मन है मेरा,
उर्वित भूपटल,
वादें हैं मेरे,
अविचल अटल,
स्थिर मन अटल।
✒ अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
शुक्रवार, 1 जनवरी 2016
योग करो भई योग करो
योग करो भई योग करो
सुबे शाम सब योग करो
मिल जुल के सब लोग करो
ताज़ा हवा के भोग करो
योग करो भई योग करो ।।
जल्दी उठ के दंउड लगाओ
आगे पीछे हाथ घुमाओ
कसरत अऊ दंड बैठक लगाओ
शरीर ल निरोग बनाओ
प्राणायाम अऊ ध्यान करो
योग करो भई योग करो ।।
सुबे शाम सब घुमे ल जाओ
शुद्ध हवा ल रोज के पाओ
ताजा ताजा फल ल खाओ
शरीर ल मजबूत बनाओ
नियम संयम के पालन करो
योग करो भई योग करो ।।
जेहा करथे रोज के योग
वोला नई होवे कुछु रोग
उमर ओकर बढ़ जाथे
हंसी खुशी से दिन बिताथे
रोज हांस के जीये करो
योग करो भई योग करो ।।
रात दिन के चिंता छोड़
योग से अपन नाता जोड़
नशा पानी ल तेहा छोड़
बात मान ले तेहा मोर
लइका सियान सब झन करो
योग करो भई योग करो ।।
योग करो भई योग करो
सुबे शाम सब योग करो .....................
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रचनाकार
महेन्द्र देवांगन "माटी"
(बोरसी - राजिम )
गोपीबंद पारा पंडरिया
(कवर्धा)
8602407353
