ब्लॉग आर्काइव

रविवार, 17 जनवरी 2016

गया था मैं एक शादी में,
एक मासूम की बर्बादी में ।
खड़ा खड़ा मैं सोच रहा था,
समधी समधी को नोच रहा था।
नेताओ का ये बंधन है,
शासन का आबंटन है।
कहते है दुनिया बदल गयी है,
महिलाओ के गालो में बालो की लड़ी है।
महंगाई बढ़ गयी है,
चेहरे पे पाउडर लिपस्टिक और मेकअप चढ़ गयी है।
बफर में खाना बंट रहा है,
भूखा भूख पट रहा है।
देश में बड़ी गरीबी है,
डस्टबिन में पड़ी मजबूरी है।
रोटी का टुकड़ा फेक दिया,
गरीब की गरीबी को भी बेंच दिया।
पैर छूने का आया रिवाज,
पैर न छुए तो नेता जी नाराज।
बोझ बन गये है माँ बाप,
पैर तले रौंदते है लाज।
किस्मत तेरा रूठ जायेगा,
अपनों का साथ छूट जायेगा।
रो रो कर तू करे पुकार,
सुना जीवन है बेकार।
जीवन तू क्या जी पाये
अकेले तो जी घबराये।
सबको अपना मान ले,
जग है तेरा जान ले।
��सुभ रात्रि��

✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें