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सोमवार, 25 जनवरी 2016

गणतंत्रता दिवस की सुभकामनाएॅं...

मैं भी सोंचू तू भी सोंच,
जरा अपनी आँखों को पोंछ ।
दुश्मन में क्या दम था ?
क्या हर हिंदुस्तानी कम था ?
आजाद भारत के हम है वासी,
कैसे बने स्वतन्त्र निवासी ।
भारत में क्यों स्वतंत्रता थी आई,
छुपी हुयी थी सबकी भलाई
कैसे और किसने है लाई ?
सन् सन्तावन की लड़ाई,
हम न भूल पाये हैं भाई ।
किसने लूटी थी लाज,
मैं अनपड़ बताऊ आज ।
सन्तावन की चिंगारी जलाये रखा,
असर सैतालिस में जाके दिखा ।
दुश्मन में न दम था,
लड़ने वाला अपना हमदम था ।
अपनों ने खंजर खोंपा था,
गुलामी को हम पर थोपा था ।।
आजादी की जो चिंगारी थी,
हमको प्राणों से प्यारी थी ।
भारत के सहस्त्र सपूतों ने,
माँ भारती के पुतों ने ।
कितनों ने थी खून बहाई,
अंग्रेजों से हुयी लड़ाई ।
हिंसा और अहिंसा की,
वो बेजोड़ कहानी थी ।
लड़कर मरने वाली हर नारी,
माँ भारती की बेटी मर्दानी ।
दोलन पर आंदोलन था,
रक्त तब अनमोल न था ।
इतिहास की वो कहानी थी,
कुर्बान लाखों जवानी थी ।
हिंदी, हिन्दू, हिन्दुस्तान,
कैसे बन गया पाकिस्तान ।
फुट डाला शासन किया,
हर भारत वासी का खून पिया ।
सहन शक्ति जब अंत हुआ,
अत्याचार का तब अंत हुआ ।
डर कर कायर भांगे थर-थर,
वर्ना जाते कंधो पर चढ़कर ।
देव संस्कृति की सभ्यता क्यों हारी,
जाने जग और अम्बर सारी ।
क्या दुश्मन वो चला गया,
क्या मुश्किल वो टल गया ।
फिर लूटेगा, फिर फूटेगा,
स्वतंत्रता का भ्रम टूटेगा ।
अत्याचारी सिने पर बैठ गया,
घर घर में घूसकर लेट गया ।
अब भी क्या हम चुप बैठेंगे,
माँ का लूटता श्रृंगार देखेंगे ।
बेकार हमारी जवानी है,
हम से तो खूब कहानी ।
पहले वो व्यापारी था,
पर मन से अत्याचारी था।
अब बन गया है मेहमान,
पुरे कर रहा अपने अरमान।
पहले लूटा बल के दम पर,
अब लूट रहे तानाशाही जमकर।
दुश्मन घर घूस आया है आज,
माँ भारती की बचालो लाज ।
भाई-भाई को काट रहा है,
माता को टुकड़ो में बाँट रहा है ।
लूट रही भारत की नारी,
पश्चिमी सभ्यता है हमको प्यारी ।
अनपढ़ हूँ मैं अज्ञान नहीं,
बेकार किसी का बलिदान नहीं ।
आवो मिलकर साथ चले,
हम भी तो इतिहास लिखे ।

सभी भारत वासी को गणतंत्रता दिवस
की हार्दिक सुभकामनाएॅं...
! वन्दे मातरम !
लोकनाथ सेन ‘‘अनपढ़’’
अमेराए बलौदा बाजार
मो न 9977580623

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