कवि मैं नहीं,
न मैं साहित्यकार ।
न जानू मैं
साहित्य का झंकार ।
मैं तो बस,
कागज एक कोरा।
भूखे के सामने,
रखा खाली कटोरा।
अधजल गगरी,
सारे जहां में पसरी ।
छलकत जाये,
जहा जहा से गुजरी।
साहित्य से अज्ञान,
शब्दों से परेसान।
न जाने क्या है,
छंद, रस और अलंकार।
न मुझमें,
तनिक भर अहंकार ।
मै तो हूँ,
कवीता में लोफर,
जैसे तास में,
रहता है जोकर।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन

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