जीवन एक दौड़ है,
पढना इसका आरम्भ ।
पढ़ लिखके क्या बनोगे,
अच्छी नौकरी करोगे ।
नौकरी मिली अब बोलो,
शादी के लिए घूँघट खोलो।
विवाह हुआ अब बच्चों की बारी,
नर्सरी भेजु या आँगन बाडी।
पढ़ लिखकर हुआ बड़ा,
नौकरी की आस लगाये खड़ा।
अधिकारी को घुस खिलाओ,
बेटे की नौकरी लागाओ।
लाखो का दहेज़ जमाओ,
सुंदर शुशील दामाद पाओ।
बुढ़ापे का एक सहारा,
कौन बनेगा अब तूम्हारा ।
बेटी चली ससुराल हुयी परायी,
बीटा भुला जब से बिवीई घर आई।
अब बोलो क्या तुमने पाया,
जीवन भर जो भागम भाग मचाया।
बुढ़ापे का कौन सहारा,
ढाई गज जमीन ही मिल पाया।
✒ अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
ब्लॉग आर्काइव
शुक्रवार, 8 जनवरी 2016
जीवन दौड़
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