जीवन पथ में बढ़ रहा था,
खुद से मैं तो लड़ रहा था,
जमाने में कोई संग नहीं था,
खुसिया थी कोई गम नहीं था,
अपने पराये जो भी आये,
मैंने तो बस सब गले लगाये,
राह आसान अब बन पाये,
पराये अपने बन जाये,
देख जमाने की राह,
निकल रही थी आह।
दोस्त दुश्मन की क्या पहचान,
लोग करते है अपनों का अपमान।
सुभरात्रि
अनपढ़
लोकनाथ सेन

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