ब्लॉग आर्काइव

सोमवार, 25 जनवरी 2016

क्या मैं स्वतन्त्र हूँ ??

लाखो के भीड़ में मैं अकेला,
माँ के सम्मान में कैसा झमेला।
ऑनलाइन लाइन की दुनिया है,
राष्ट्र भक्ति भी अब मजबूरिया है।
प्रश्न मेरे मन में है उठाता,
स्वतंत्रता आयी ये सोचता।
क्या स्वतन्त्र है हम ये सच है,
जीवन में कितना मच मच है।
गरीब गरीब हो रहा ये सच है।
आमिर अपने आमिरी में मस्त है।
नौकर शाहो को नौकरी की है चिंता,
गरीब की रोटी हर कोई है छिनता।
कपड़ो का अम्बार लगा,
गरीब नंगे बदन पला।
भारत अन्न का भंडार,
किसान क्यों है बदहाल।
तकनीक का जमाना है आया,
भूखों को न मिलता है खाना।
एक प्रश्न फिर से उठता है,
मेरे अंतस को नोचता है।
क्या मैं स्वतन्त्र हूँ,
या फिर परतंत्र हूँ।
जो है स्वतंत्र उनको बधाई,
पर जारी रहेगी मेरी लड़ाई।
पैसो का है बोल बाला,
गांधी को भी नोच डाला।
भाग दौड़ की कैसी जिन्दगी,
धन दौलत की करते बंदगी।
सवाल मेरा अब भी खड़ा,
मेरे आगे आके अडा।
क्या मैं स्वतन्त्र हूँ❓❓
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जो स्वतन्त्र है उनको बधाई,
मेरी तो जारी है लड़ाई।
मन में जिनके प्रश्न अनेक,
चल मेरे साथ घुटने न टेक...
✒लोकनाथ सेन "अनपढ़"
अमेरा, बलौदा बाजार
मो 9977580623

गणतंत्रता दिवस की सुभकामनाएॅं...

मैं भी सोंचू तू भी सोंच,
जरा अपनी आँखों को पोंछ ।
दुश्मन में क्या दम था ?
क्या हर हिंदुस्तानी कम था ?
आजाद भारत के हम है वासी,
कैसे बने स्वतन्त्र निवासी ।
भारत में क्यों स्वतंत्रता थी आई,
छुपी हुयी थी सबकी भलाई
कैसे और किसने है लाई ?
सन् सन्तावन की लड़ाई,
हम न भूल पाये हैं भाई ।
किसने लूटी थी लाज,
मैं अनपड़ बताऊ आज ।
सन्तावन की चिंगारी जलाये रखा,
असर सैतालिस में जाके दिखा ।
दुश्मन में न दम था,
लड़ने वाला अपना हमदम था ।
अपनों ने खंजर खोंपा था,
गुलामी को हम पर थोपा था ।।
आजादी की जो चिंगारी थी,
हमको प्राणों से प्यारी थी ।
भारत के सहस्त्र सपूतों ने,
माँ भारती के पुतों ने ।
कितनों ने थी खून बहाई,
अंग्रेजों से हुयी लड़ाई ।
हिंसा और अहिंसा की,
वो बेजोड़ कहानी थी ।
लड़कर मरने वाली हर नारी,
माँ भारती की बेटी मर्दानी ।
दोलन पर आंदोलन था,
रक्त तब अनमोल न था ।
इतिहास की वो कहानी थी,
कुर्बान लाखों जवानी थी ।
हिंदी, हिन्दू, हिन्दुस्तान,
कैसे बन गया पाकिस्तान ।
फुट डाला शासन किया,
हर भारत वासी का खून पिया ।
सहन शक्ति जब अंत हुआ,
अत्याचार का तब अंत हुआ ।
डर कर कायर भांगे थर-थर,
वर्ना जाते कंधो पर चढ़कर ।
देव संस्कृति की सभ्यता क्यों हारी,
जाने जग और अम्बर सारी ।
क्या दुश्मन वो चला गया,
क्या मुश्किल वो टल गया ।
फिर लूटेगा, फिर फूटेगा,
स्वतंत्रता का भ्रम टूटेगा ।
अत्याचारी सिने पर बैठ गया,
घर घर में घूसकर लेट गया ।
अब भी क्या हम चुप बैठेंगे,
माँ का लूटता श्रृंगार देखेंगे ।
बेकार हमारी जवानी है,
हम से तो खूब कहानी ।
पहले वो व्यापारी था,
पर मन से अत्याचारी था।
अब बन गया है मेहमान,
पुरे कर रहा अपने अरमान।
पहले लूटा बल के दम पर,
अब लूट रहे तानाशाही जमकर।
दुश्मन घर घूस आया है आज,
माँ भारती की बचालो लाज ।
भाई-भाई को काट रहा है,
माता को टुकड़ो में बाँट रहा है ।
लूट रही भारत की नारी,
पश्चिमी सभ्यता है हमको प्यारी ।
अनपढ़ हूँ मैं अज्ञान नहीं,
बेकार किसी का बलिदान नहीं ।
आवो मिलकर साथ चले,
हम भी तो इतिहास लिखे ।

सभी भारत वासी को गणतंत्रता दिवस
की हार्दिक सुभकामनाएॅं...
! वन्दे मातरम !
लोकनाथ सेन ‘‘अनपढ़’’
अमेराए बलौदा बाजार
मो न 9977580623

स्वतंत्रता की अलख जगाई,
मातृभूमि के लिए लड़ाई।
वो जग कैसे छूट गया,
देश मेरा क्यों टूट गया।
तुष्टिकरण की निति है लाई,
जग सत्ता और खुद की भलाई।
अपनों अपनों में हुयी लड़ाई,
सपूतो को मिली तन्हाई।
गुमनाम सी जिंदगी,
मातृभूमि की बंदगी।
ले चला था वो डगर में
राष्ट्र की डूबती नइया पार,
डूब गया वो बिच मझधार।
गुमनाम जिसकी जिंदगी,
बदनाम जिसकी कर दी हस्ती।
राजनीती का दुर्बल अखाडा,
था जिसने हर दम ललकारा।
सत्ता के भूखे थे जितने,
अपने साधने थे निकले।
जग हम पर अब हांस रहा,
देशद्रोही ताण्डव नाच रहा।
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आजाद हिन्द के सिपाही
अमर शहीद ������������
नेता जी सुभाष चंद्र बोस जयंती पर भावपूर्ण वंदन।

✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
अमेरा बलौदा बाजार
मो 9977580623

देख गुलामी की जंजीरे
माता कभी रोई थी।
न जाने कितने रातो से,
वो चैन से नहीं सोई थी।
बेटे के तन पे कपड़ा हो,
माता की यही अभिलाषा थी,
माता ठण्ड से सिकुड़ रही थी।
बेटा सोया है आराम से,
बस इतना ही दिलाशा थी।
जब स्वतन्त्र हो जाउंगी मैं,
बेटा मेरी मान बढ़ाएगा,
चैन से अपनी गोदी में,
मुझको वो सुलयेगा।
माता कहके मुझे तब बेटा,
अपने गले गलयेगा।
माता नहीं अमाता,
पुत्र कैसे कुपुत्र हुआ।
माता रोई है जनम जनम,
बेटा अब भी चैन से सोया।
माता अब भी करे जगराता,
बेटे को पर सरम न आता।
भुला वो माता का प्यार,
भारी पड़ा बीवी का दिन चार।
★अनपढ़
लोकनाथ सेन