ब्लॉग आर्काइव

शनिवार, 16 जनवरी 2016

लिखना एक कला है,
सुंदरता बला है।
लिखके मैं बिक गया,
सुंदरता छुप गया।
क्यों है इतनी खामोशी,
जीवन में मदहोशी।
ले चला मैं खुद की नैया,
काँटों भरी है जीवन शैया।
बदल रहा है जग में मानव,
पग पग में मिलते है दानव।
जिंदगी अब भी भारी है,
इंसानियत अब बीमारी है।
बने है पक्ष विपक्ष,
क्यों नहीं कोई मानवता के समकक्ष।
रक्षक कौन मै सोंच रहा,
भक्षक मासूमियत नोच रहा।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन

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