प्रमाण नहीं,
सम्मान दीखता है ।
ह्रदय से निकला,
वो दर्द दीखता है ।
खरीददार चाहिए,
इंसान भी बिकता है ।
रात आती जाती है,
बात पर बहुत कुछ बाकि है,
कहने को तो सूरज ही डूबा है,
अभी नया सवेरा आना बाकि है ।
मन भ्रमित,
विचार दिग्भ्रमित,
मैं सम्मिलित।
शुभ रात्रि।
आंधी में दीप,
बहते रहे शीप,
जले नौदीप।
ब्लॉग आर्काइव
शुक्रवार, 8 जनवरी 2016
जीवन दौड़
जीवन एक दौड़ है,
पढना इसका आरम्भ ।
पढ़ लिखके क्या बनोगे,
अच्छी नौकरी करोगे ।
नौकरी मिली अब बोलो,
शादी के लिए घूँघट खोलो।
विवाह हुआ अब बच्चों की बारी,
नर्सरी भेजु या आँगन बाडी।
पढ़ लिखकर हुआ बड़ा,
नौकरी की आस लगाये खड़ा।
अधिकारी को घुस खिलाओ,
बेटे की नौकरी लागाओ।
लाखो का दहेज़ जमाओ,
सुंदर शुशील दामाद पाओ।
बुढ़ापे का एक सहारा,
कौन बनेगा अब तूम्हारा ।
बेटी चली ससुराल हुयी परायी,
बीटा भुला जब से बिवीई घर आई।
अब बोलो क्या तुमने पाया,
जीवन भर जो भागम भाग मचाया।
बुढ़ापे का कौन सहारा,
ढाई गज जमीन ही मिल पाया।
✒ अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
अटल मन
कवि संगती,
होती बड़ी दुर्गति,
कवि की माया,
अनपढ़ थर्राया,
मन में घबराया।
शब्दों के बाण,
लगते जैसे त्राण।
मन को मोहे,
शब्दों को नित जोहे,
छंद सोरठा दोहे ।
मन है मेरा,
उर्वित भूपटल,
वादें हैं मेरे,
अविचल अटल,
स्थिर मन अटल।
✒ अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
