कुछ लोगो को लगता है,
मैं आइना दिखाता हूँ।
पगले मैं अपनी खिड़की का,
आइना रोज चमकता हूँ।
कब से टुटा है मेरे घर का,
आइना कुछ याद नहीं।
कांच के टुकड़े चुभते है,
आईने की ये याद सही।
मैं तो हर महीने वेतन भी,
ठीक से नहीं ले पाता हूँ।
कंघी करने भी रोज मैं,
गुजरती गाडियो के पास चले जाता हूँ।
✒अनपढ
लोकनाथ सेन

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