ब्लॉग आर्काइव

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

शब्दों की जो बोली है,
रिस्तो की हंसी ठिठोली है ।
देख बातो के माया जाल,
भुला मैं अपना शब्द ज्ञान ।
लेकर मसाल चल चला मैं,
अनपढ़ अज्ञान बढ़ा मैं ।
शब्दों का मैं दीप जलाऊ,
अशिक्षा का अंधकार हटाउ।

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