ब्लॉग आर्काइव

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

सोच जमाने की बदल सकता नहीं।
कदम बढे उसे रोक सकता नहीं।
कहने वाले कहते रहते है
उन्हें मैं टोक सकता नहीं।
जिंदगी मेरी एक संघर्ष है
आराम मैं कर सकता नहीं।
लोग भगवान में कमी खोज लेते है
मैं उनकी बातों से अटक सकता नहीं।
जमाने में तौहीन होतीं है हरकिसी की
ऐसे तौहीनो से अब मैं डरता नहीं ।
दर्द और तकलीफ के राह पर चला हूँ
दर्द का डर होता तो मैं चलता नहीं।
कहने वाले को कौन रोक पाया है
इसलिए मैं भी कुछ कहता नहीं।
जमाने में बदलना है बहुत कुछ
इसलिए मैं बैठकर रहता नहीं।
सहने वाले को जमाना ठोकरे मारता है
इसलिए अब मैं चुपचाप संहता नहीं।
��अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623