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सोमवार, 25 जनवरी 2016

देख गुलामी की जंजीरे
माता कभी रोई थी।
न जाने कितने रातो से,
वो चैन से नहीं सोई थी।
बेटे के तन पे कपड़ा हो,
माता की यही अभिलाषा थी,
माता ठण्ड से सिकुड़ रही थी।
बेटा सोया है आराम से,
बस इतना ही दिलाशा थी।
जब स्वतन्त्र हो जाउंगी मैं,
बेटा मेरी मान बढ़ाएगा,
चैन से अपनी गोदी में,
मुझको वो सुलयेगा।
माता कहके मुझे तब बेटा,
अपने गले गलयेगा।
माता नहीं अमाता,
पुत्र कैसे कुपुत्र हुआ।
माता रोई है जनम जनम,
बेटा अब भी चैन से सोया।
माता अब भी करे जगराता,
बेटे को पर सरम न आता।
भुला वो माता का प्यार,
भारी पड़ा बीवी का दिन चार।
★अनपढ़
लोकनाथ सेन

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