ब्लॉग आर्काइव

बुधवार, 13 जनवरी 2016

ये मेरी चेष्ठा,
नहीं बने दृष्ठता,
इतनी इच्छा।

कवि का दुःख,
शब्दों में गया रुक,
आंसु में सुख।

समझे बढ़े
छंद में आगे बढ़े
सीढ़ियाँ चढ़े.......

रो देने से कम
गम का भार नहीं होता।
हँसने से जालिम,
किसी से भी प्यार नहीं होता।
दिल जो टुटा है मेरा,
जीवन में आया है अँधेरा ।
मौसम आज नहीं तो
कल बादलेगा,
सूरज फिर निकलेगा,
दिन सुनहरा आएगा।

मुस्कान है मेरे चहरे पर,
हर किसी को यही दीखता है।
इंसान तो साथ होते है,
पर इंसानियत कहा मिलता है।

कल किसने देखा है,
जो पास है वो अपना है।
क्यों सोचते हो कल का,
तकाजा नहीं हर पल का।

जुदा इंसान होता है,
मन तो पास होता है,
जुदाई का गम न पाल,
ये गम बनेंगे ढाल।

कवितालय एक मंदिर,
कवि है जिसमे पुजारी,
कविताओ की आरती,
जय करा माँ भारती।

सोने की कीमत
जौहरी ही समझता है,
लोहार तो कबाड़ में
लोहा खोजता रहता है।
कवि की कविता,
साहित्यकार समझ पाता है,
पढ़े लिखे अनपढ़,
मात्रावो में त्रुटिया
खोजते रह जाता है

नवा बहु सुहाथे,
नवा साग मिठाथे,
नवा नवा में
कवि तको जादा लिख पाथे��

सर्व शिक्षा अभियान

सर्व शिक्षा
अभियान,
झन कर अतका
अभिमान।
लेगाबो तोला,
शमशान।
तोर दया कृपा ले,
रोये लइका
अउ सियान।
शिक्षा के दुर्गति,
तोर कृपा हे अति।
मध्यान्ह भोजन
खवाये,
लइका ल अबड़,
खेलाये।
भवन सेप्टिक
सब्बो बनाये,
लइका मन ल
पढ़े लिखे
अनपढ़ बनाये।
न शिक्षा के पता,
न शिक्षक के पता,
चल चला
पोर्टफोलियो बना।
किसम किसम
के दिन गिनाए,
दाई दादा के,
मन भरमाये।
अधिकारी मन,
दबाके कमाए।
पैसा मिलिस पोठ,
अधिकारी मन के,
बडे बड़े गोठ।
शिक्षक मन ला,
डंडा परिस,
रोठ रोठ।
पढ़ाये ल भुलागे,
साग ल सुधारे,
वेतन बर
गली गली
छुछुवारे।
स्कूल ले बने,
शमशान हे,
पढ़े के लइक
उही बने
सुनसान हे।
जेन ल देखबे
तेन स्कूल में
आवत हे।
गुरूजी जी ल
चमकावत हे।
लईका मन
तको गुरूजी ल
डरवावत हे।
अंगूठा छाप नेता,
पढ़े लिखे गुरूजी ल
समझावत हे।
ले ग अब हमरो
बने दिन आवत हे।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623