कविता गढ़ा,
गुरुवर मैं बढ़ा,
पर्वत खड़ा।
ब्लॉग आर्काइव
शुक्रवार, 15 जनवरी 2016
तुझे याद करते हुए सारी रात बैठा था,
याद नहीं की जागा था या सोया था ।
तश्वीर तेरी आँखों में छप गयी है,
याद रहति दिन रात तू वही है।
जीवन जीना भूल गया मैं,
जब से तेरा दीदार किया मैं ।
सुबह हुयी तो उठ गया,
लोगों ने बताया लूट गया।
सारी रात सीने से तश्वीर तेरा लगा रखा था,
तश्वीर में उस नाम तेरा माँ भारती लिखा रखा था।
शुभ प्रभात
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
चेहरे की तेरी मुस्कान
कर देती है हैरान,
पागल बना तेरी एक नजर का,
अब तो बस इंतजार है कबर का।
आशिकी में लोग आफत कर देते है,
पर लोग हमारी सराफत का मिसाल देतें है।
वो हलकी सी तेरे चेहरे की मुस्कान,
आज भी बैठे है हम सीना तान।
जुनून था इश्क का तेरा दीदार हो जाये,
हम तो बैठे है की एक बार फिर से प्यार हो जाये,
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
शुभ रात्रि
क्या मैं नहीं जिम्मेदार ?
भाई भाई की टांग खिंच रहा,
पडोसी आँखे मिंज रहा ।
अपना पराया समझ न आया,
अपनों को दुःख पहुचाया।
टाई गले में खोंच रहा,
अपनों को ही नोच रहा।
टुकड़ो में बटा घरबार,
हस रहा जग संसार।
घर घर में झगड़े,
बढ़ रहे है लफड़े ।
बेटी की है चाह,
बेटा है गुमराह।
घर द्वार को छोड़ रहा,
उम्मीदों को तोड रहा।
बेटे की क्या गलती,
बहु नहीं है अपनी।
जिम्मेदारी से भागा,
बेटा बना अभागा।
कितनी जिम्मेदारी,
क्या थी होशियारी।
टुटा जो परिवार,
सुधर गया संसार।
घर पहली पाठशाला,
बन गया मधुशाला।
बदल गए है संस्कार,
घर घर होते अत्याचार।
बेटी का हुआ बलात्कार,
परिवार खड़ा लाचार ।
विधि का कैसा विधान,
भारत का संविधान ।
परिस्कृत हुआ सम्मान,
नेता का अभिमान।
धन का बढ़ा मान,
अधिकारी बेईमान।
मजाक बना कानून,
मानवता का हुआ खून।
तन्हा बैठ मैं भी सोचु,
कितनो की आँखे पोछू।
बढ़ रहा है हाहाकार,
क्या मैं नहीं जिम्मेदार।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
बलौदाबाजार
9977580623
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