ब्लॉग आर्काइव

रविवार, 24 अप्रैल 2016

ऐसे टूट के बिखरी है जिंदगी
अब सिमटने का मन करता है।
टूट के पत्थर भी मिटटी बन जाती है,
अब मिटटी से लिपटने का मन करता है।

��शुभरात्रि����