कविताये गढ़ रहे है,
कवि लड़ रहे है ।
किस बात की ये है लड़ाई,
वर्चश्व कहा से आई ।
साहित्य की मधुर बेला,
किसने अहम् को धकेला ।
मैं की ले दूहाई,
लड़ रहे हैं भाई भाई।
साहित्य एक बंधन है,
क्या ये रिस्तो से कम है।
अकेला अनजान चल रहा था,
बिन नीव के महल गढ रहा था।
साथ मिला संताप मिला,
कवियों का आशीर्वाद मिला।
मुझ अनपढ़ अज्ञान को,
शब्दों का दान मिला।
शब्द जो मेरे थे कोरे,
अब भी कुछ हैं अधूरे ।
साथ कब विपरीत धुरे,
होंगे कविता कब मेरे पुरे।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
ब्लॉग आर्काइव
सोमवार, 11 जनवरी 2016
कवि का दर्द
छमताओ को जानकर हमने,
छमताओ को जानकर हमने,
अपना कदम बढ़ाया है।
इतिहास हवाह है,
इतिहास ने इतिहास को,
हर बार दोहराया है ।
सम्मान क्या अपमान क्या,
क्या मैंने साथ लाया ।
जो भी है मेरे पास,
आप सभी से है मैंने पाया ।
कुछ भी नहीं है मेरा अपना,
फिर क्यों मेरा मेरा रटना।
समाज में पाये सम्मान समर्पण,
क्या मेरा जिसे न कर सकु अर्पण।
सारे जहाँ में फैला घर्षण,
समाज है सबका दर्पण।
कई बार गया मै हार,
फिर से खड़ा हुआ हरबार।
स्वतंत्र रहा है मेरा विचार,
अभिव्यक्ति है मेरा अधिकार।
झुका नहीं कभी डरा नहीं,
हार कर भी कभी हारा नही।
शिक्षा को समर्पित मेरा तन मन,
समाज को अर्पित सारा जीवन।
सपना किसी का तोडा नहीं,
जीवन में मेरे कोई रोड़ा नहीं।
काठीनाइ आते है आये,
उनसे भी दो दो हाथ हो जाये।
मातृ भूमि का कर्ज चुकाने,
माँ की सेवा में शीश कटाने।
✒अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
अमेरा, बलौदा बाजार
मो 9977580623
