कवि मैं नहीं,
न मैं साहित्यकार ।
न जानू मैं
साहित्य का झंकार ।
मैं तो बस,
कागज एक कोरा।
भूखे के सामने,
रखा खाली कटोरा।
अधजल गगरी,
सारे जहां में पसरी ।
छलकत जाये,
जहा जहा से गुजरी।
साहित्य से अज्ञान,
शब्दों से परेसान।
न जाने क्या है,
छंद, रस और अलंकार।
न मुझमें,
तनिक भर अहंकार ।
मै तो हूँ,
कवीता में लोफर,
जैसे तास में,
रहता है जोकर।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
ब्लॉग आर्काइव
मंगलवार, 12 जनवरी 2016
जोकर...
कविताये गढ़ रहे ह
कविताये गढ़ रहे है,
कवि लड़ रहे है ।
किस बात की ये है लड़ाई,
वर्चश्व कहा से आई ।
साहित्य की मधुर बेला,
किसने अहम् को धकेला ।
मैं की ले दूहाई,
लड़ रहे हैं भाई भाई।
साहित्य एक बंधन है,
क्या ये रिस्तो से कम है।
अकेला अनजान चल रहा था,
बिन नीव के महल गढ रहा था।
साथ मिला संताप मिला,
कवियों का आशीर्वाद मिला।
मुझ अनपढ़ अज्ञान को,
शब्दों का दान मिला।
शब्द जो मेरे थे कोरे,
अब भी कुछ हैं अधूरे ।
साथ कब विपरीत धुरे,
होंगे कविता कब मेरे पुरे।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
साक्षर त होवथे
दू ठन कुरिया,
स्कूल हे दुरिहा।
भात मिलथे पूरा,
शिक्षा हे अधूरा ।
गुरुजी कब पढ़ाथे,
दार भात खवाथे।
स्कूल के हाल बेहाल,
शिक्षा हे बदहाल ।
गुणवत्ता के नाम दिस,
आनी बानी दिन गिनिश्।
डाक ल बनइस,
गुरूजी कहां पढ़ईस।
पहाड़ा ल रट,
पाठ सफाचट।
गाना ल गवइस,
शिक्षा ल भूलइस।
जनगणना करिस,
लइका ल नई चिन्हीस।
गली गली ल घुमिस्,
स्कूल ल भूलिस।
शिक्षा बदहाल हे,
अधिकारी मालामाल हे,
गुरूजी कंगाल हे,
शासन के कमाल हे।
शिक्षा ल भुलागे,
पढ़े के दिन मुंदागे,
पास फैल नंदागे,
दाई ददा के बया भुलागे।
नवा तरीका ले पढ़ा,
गुरुजी तको अब अड़हा,
पढ़ा चाहे झन पढ़ा,
लइका ल आगू बढ़ा।
वेतन झन मांग,
झोला ल टांग,
गली ल लाँघ,
गुरूजी तको उटपटांग।
लइका पास होवथे,
गुरूजी रोवथे,
दाई ददा सोचथे,
शासन कथे,
अरे साक्षर त होवथे।
✒ अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
