ब्लॉग आर्काइव

सोमवार, 25 जनवरी 2016

स्वतंत्रता की अलख जगाई,
मातृभूमि के लिए लड़ाई।
वो जग कैसे छूट गया,
देश मेरा क्यों टूट गया।
तुष्टिकरण की निति है लाई,
जग सत्ता और खुद की भलाई।
अपनों अपनों में हुयी लड़ाई,
सपूतो को मिली तन्हाई।
गुमनाम सी जिंदगी,
मातृभूमि की बंदगी।
ले चला था वो डगर में
राष्ट्र की डूबती नइया पार,
डूब गया वो बिच मझधार।
गुमनाम जिसकी जिंदगी,
बदनाम जिसकी कर दी हस्ती।
राजनीती का दुर्बल अखाडा,
था जिसने हर दम ललकारा।
सत्ता के भूखे थे जितने,
अपने साधने थे निकले।
जग हम पर अब हांस रहा,
देशद्रोही ताण्डव नाच रहा।
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आजाद हिन्द के सिपाही
अमर शहीद ������������
नेता जी सुभाष चंद्र बोस जयंती पर भावपूर्ण वंदन।

✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
अमेरा बलौदा बाजार
मो 9977580623

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