शुभ ने लिया है आकर
मिले सुभ समाचार।
सुबह हुयी सूरज उगी,
करो कुछ नवाचार।
(गुड मॉर्निंग दोहा)
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
लिखना एक कला है,
सुंदरता बला है।
लिखके मैं बिक गया,
सुंदरता छुप गया।
क्यों है इतनी खामोशी,
जीवन में मदहोशी।
ले चला मैं खुद की नैया,
काँटों भरी है जीवन शैया।
बदल रहा है जग में मानव,
पग पग में मिलते है दानव।
जिंदगी अब भी भारी है,
इंसानियत अब बीमारी है।
बने है पक्ष विपक्ष,
क्यों नहीं कोई मानवता के समकक्ष।
रक्षक कौन मै सोंच रहा,
भक्षक मासूमियत नोच रहा।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
जीवन पथ में बढ़ रहा था,
खुद से मैं तो लड़ रहा था,
जमाने में कोई संग नहीं था,
खुसिया थी कोई गम नहीं था,
अपने पराये जो भी आये,
मैंने तो बस सब गले लगाये,
राह आसान अब बन पाये,
पराये अपने बन जाये,
देख जमाने की राह,
निकल रही थी आह।
दोस्त दुश्मन की क्या पहचान,
लोग करते है अपनों का अपमान।
सुभरात्रि
अनपढ़
लोकनाथ सेन