ब्लॉग आर्काइव

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

साहित्य से मैं अनजान,
सीखा मैंने देख समसान ।
इंसानियत से इंसान को पहचान,
न जाने कौन है भगवान।
दौड़ रहा है दुनिया हर पल,
माया फैली जग में पलछिन।
कोई न किसी का अपना,
झूठ निकला हर एक सपना।
मैं भी सोचु एक कविता गढ़ु,
शौक नहीं की अनपढ़ दिखूं

लोकनाथ सेन

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें