साहित्य से मैं अनजान,
सीखा मैंने देख समसान ।
इंसानियत से इंसान को पहचान,
न जाने कौन है भगवान।
दौड़ रहा है दुनिया हर पल,
माया फैली जग में पलछिन।
कोई न किसी का अपना,
झूठ निकला हर एक सपना।
मैं भी सोचु एक कविता गढ़ु,
शौक नहीं की अनपढ़ दिखूं
लोकनाथ सेन

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