ब्लॉग आर्काइव

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

कविताये गढ़ रहे ह

कविताये गढ़ रहे है,
कवि लड़ रहे है ।
किस बात की ये है लड़ाई,
वर्चश्व कहा से आई ।
साहित्य की मधुर बेला,
किसने अहम् को धकेला ।
मैं की ले दूहाई,
लड़ रहे हैं भाई भाई।
साहित्य एक बंधन है,
क्या ये रिस्तो से कम है।
अकेला अनजान चल रहा था,
बिन नीव के महल गढ रहा था।
साथ मिला संताप मिला,
कवियों का आशीर्वाद मिला।
मुझ अनपढ़ अज्ञान को,
शब्दों का दान मिला।
शब्द जो मेरे थे कोरे,
अब भी कुछ हैं अधूरे ।
साथ कब विपरीत धुरे,
होंगे कविता कब मेरे पुरे।
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें