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रविवार, 17 जनवरी 2016

अनपढ़ की रानी।

सुन्दर रूप मनमोहनी,
दिल की बगिया की सोहनी।
देख तुझे मेरा मन बोला,
डूब नयनो में अनपढ़ भी डोला।
बला की खूबसूरत है तू,
सुनंदरता की मूरत है तू।
न जाने क्या चमत्कार,
देख तुझे भुला घर बार।
सुंदर काले घन केश,
मन भावन तेरा है भेश।
बैठा अनपढ़ सोंच रहा,
बालो को अपने नोच रहा।
सुन्दर तेरे कटीले नैन,
रहता हर पल  मन बेचैन।
सुन्दरता की मूरत है तू,
मेरे सपनो की सूरत है तू।
बनाया खुदा ने तूझे नाजो से,
सजाया मेरे अरमानो से।
होठो की तेरी मुस्कान,
पहुचाये कइयों को समसान।
दर्शन तेरा मिला है मुझको,
लाखो दूवाये है तुझको।
ना रख कदमो को जमी पर रानी,
तेरी मेरी एक कहानी।
देख मोहब्बत जग रूठा,
मेरा तो था किस्मत फुटा।
तन्हाई में मैं बैठा,
ले के दिल अपना टूटा।
रूप की तू रानी थी,
जग से बड़ी सयानी थी।
कहानी तो पुरानी थी,
पर सबको हैरानी थी।
सबको तो परेसानी थी,
सच तो अनपढ़ की रानी।

✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
�� अमेरा, बलौदा बाजार
KCP amra- ACRR

गया था मैं एक शादी में,
एक मासूम की बर्बादी में ।
खड़ा खड़ा मैं सोच रहा था,
समधी समधी को नोच रहा था।
नेताओ का ये बंधन है,
शासन का आबंटन है।
कहते है दुनिया बदल गयी है,
महिलाओ के गालो में बालो की लड़ी है।
महंगाई बढ़ गयी है,
चेहरे पे पाउडर लिपस्टिक और मेकअप चढ़ गयी है।
बफर में खाना बंट रहा है,
भूखा भूख पट रहा है।
देश में बड़ी गरीबी है,
डस्टबिन में पड़ी मजबूरी है।
रोटी का टुकड़ा फेक दिया,
गरीब की गरीबी को भी बेंच दिया।
पैर छूने का आया रिवाज,
पैर न छुए तो नेता जी नाराज।
बोझ बन गये है माँ बाप,
पैर तले रौंदते है लाज।
किस्मत तेरा रूठ जायेगा,
अपनों का साथ छूट जायेगा।
रो रो कर तू करे पुकार,
सुना जीवन है बेकार।
जीवन तू क्या जी पाये
अकेले तो जी घबराये।
सबको अपना मान ले,
जग है तेरा जान ले।
��सुभ रात्रि��

✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623

पढ़ा लिखा जो होता है,
खुद में वो खोता है।
मनगढ़ हु अनपढ़ हूँ,
सबसे सिख रहा हूँ।
कविताओ के भव सागर
तैरते दिख रहा हूँ।
ज्ञान का मसाल नहीं,
अज्ञान ही पहचान सही।
मैं नहीं कोई साहित्यकार,
फिर भी रहा जग को ललकार।
एक छोटा सा कलमकार,
बुराइयो को मैं रहा धिक्कार।
मचा जग में है घमासान,
हर जगह दीखते है शमसान।
जनता करती त्राहि माम,
मानवता का काम तमाम ।
देख के मेरा मन भी रोता है,
दीन रात नहीं ये सोता है।
खुस हु कि मैं अनपढ़ हूँ,
कहने को तो मनगढ़ हूँ।
मैं जग की सेवा कर,
ध्यान नहीं है मेवा पर।
सीधा और सादा सही,
जीवन भर आधा सही।
अपने सुखकी कामना,
दुःख की गठरी न बांधना ।
किसी से नहीं हो सामान,
आशीष मिले यह कामना।

�� शुभ दोपहरिया��
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
�� अमेरा, बलौदा बाजार
�� 9977580623
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