ब्लॉग आर्काइव

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

राहे जिंदगी,
आसान है होती,
राहों पे सोती।

बिखरे फूल,
खाते राहों के धूल,
क्या है उसूल।

कोमल तन,
है बिखरे रतन
मासूम मन।

जब तन्हाई,
राहों में खूब रोती
तरक्की होती।

है तड़पती,
जब मासूमियत,
बदनीयत।

जड़े नक्सल,
कहते पल पल,
वापस चल।

मन चंचल,
इतना न मचल,
जरा सम्हल।

नारी अबला,
हो गयी है सबला,
कायर चला।

मासूम मन,
लूट रहा है तन,
कर मंथन।

मैं अनपढ़
करता बड़बड़,
कविता गढ़।

✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
��9977580623
�� अमेरा, बलौदा बाजार
KCP amera - ACRR

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें