मेरा मेरा क्यों करे,
क्या तेरा है बोल।
नश्वर काया ढो रहा,
क्या है तेरा मोल।
**दोहा**
ब्लॉग आर्काइव
रविवार, 17 अप्रैल 2016
अनपढ़ दोहा 01+02
भागदौड़ है जिंदगी,
कही नहीं ठहराव ।
धुप ही धुप फैला हुआ,
मिलत नहीं है छाव।
आँखे अब नम हो चली,
सावन की है आस।
बून्द बून्द है बही,
हर बून्द है खास।
ले शपथ हम जीवन में
एक दीप है जलाना।
पिछडे हुए लोगो को
हमें साथ में है लाना।
अँधेरा चहुओर है फैला
उजियारा है फैलाना।
अशिक्षा भ्रष्टाचार
बढ़ रहा है प्रतिदिन।
शिक्षा और सुरक्षा का
जग में भाव है बहाना।
कुंठित मन, शापित तन
ले कर चलने वालो को
नए समाज नई दिशा
लेकर हमको है चलना।
मेरा तेरा बहुत हुआ अब
हम को है कदम मिलाना।
नर नारी से युग है जन्मा
कन्धा मिलाकर है चलना।
कोई नहीं अब भेद भाव हो
ऐसा हमें निति अपनाना है।
जगतगुरु फिर बन जाये हम
ऐसी निति है अब अपनाना।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
वाट्सअप 9144886001
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