ब्लॉग आर्काइव

सोमवार, 18 जनवरी 2016

कविताओ के गागर में,
डूब ले इस भवसागर में।
जिन्दा रहना चाहता कौन है,
इस जमाने में,
जिन्दा रहने के लिए लोग जाते है,
मयखाने में ।
जादू नहीं शराब है,
जमाना कहता है खराब हैं।
कुछ को ये चिंता सताती है,
उनकी कविता बताती है,
चोरी से घबराती है।
हो जायेगी कविता चोरी,
इतनी छोटी है कमजोरी।
कौन चुरा ले जायेगा,
वो भाव कहा से लाएगा।
शब्दों को हेर फेर कर,
एक नयी कविता बनाएगा।
पर कविता में छुपे,
मेरे दर्द को कहा से पाएगा।
दुनिया में छाएगा,
पर जो टुटा दिल है मेरा,
वो टुटा दिल कहा से लाएगा।
जग देख रहा है हरपल,
सरेख रहा है कलकल।
वो एक कविता चुराएगा,
मैं दस कविता बनाऊंगा ।
वो दस कविता चुराएगा,
मैं सौ शब्द ले आऊंगा।
शब्दों के सागर में जाऊंगा,
एक मटका भर कर लाऊंगा।
कविता दिल से बनाउंगा,
गीत बना के गाऊंगा।
जमाना तरसता रहता है,
अनपढ़ बरसता रहता है।
मेरी कविताओ की बोली,
नहीं हंसी ठिठोली।
जो न मिला कन्धा किसी का,
अकेले में चुपचाप है रोली।
सबके सर चढ़कर है बोली,
अनपढ़ की कविता की झोली।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
��9977580623
�� अमेरा, बलौदा बाजार
��KCP amera:ACRR