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मंगलवार, 12 जनवरी 2016

साक्षर त होवथे

दू ठन कुरिया,
स्कूल हे दुरिहा।
भात मिलथे पूरा,
शिक्षा हे अधूरा ।
गुरुजी कब पढ़ाथे,
दार भात खवाथे।
स्कूल के हाल बेहाल,
शिक्षा हे बदहाल ।
गुणवत्ता के नाम दिस,
आनी बानी दिन गिनिश्।
डाक ल बनइस,
गुरूजी कहां पढ़ईस।
पहाड़ा ल रट,
पाठ सफाचट।
गाना ल गवइस,
शिक्षा ल भूलइस।
जनगणना करिस,
लइका ल नई चिन्हीस।
गली गली ल घुमिस्,
स्कूल ल भूलिस।
शिक्षा बदहाल हे,
अधिकारी मालामाल हे,
गुरूजी कंगाल हे,
शासन के कमाल हे।
शिक्षा ल भुलागे,
पढ़े के दिन मुंदागे,
पास फैल नंदागे,
दाई ददा के बया भुलागे।
नवा तरीका ले पढ़ा,
गुरुजी तको अब अड़हा,
पढ़ा चाहे झन पढ़ा,
लइका ल आगू बढ़ा।
वेतन झन मांग,
झोला ल टांग,
गली ल लाँघ,
गुरूजी तको उटपटांग।
लइका पास होवथे,
गुरूजी रोवथे,
दाई ददा सोचथे,
शासन कथे,
अरे साक्षर त होवथे।
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✒ अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
मो 9977580623

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