प्रमाण नहीं,
सम्मान दीखता है ।
ह्रदय से निकला,
वो दर्द दीखता है ।
खरीददार चाहिए,
इंसान भी बिकता है ।
रात आती जाती है,
बात पर बहुत कुछ बाकि है,
कहने को तो सूरज ही डूबा है,
अभी नया सवेरा आना बाकि है ।
मन भ्रमित,
विचार दिग्भ्रमित,
मैं सम्मिलित।
शुभ रात्रि।
आंधी में दीप,
बहते रहे शीप,
जले नौदीप।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें