घर वाली जब मइके जाथे,
त गोसिया ल रई रई के सुरता आथे ।
साग भात म अबड़ भेद निकालथे,
तेन चुपे चाप जरहा रोटि अउ भात ल खाथे ।
अपन हाथ म कपड़ा ल धो,
कथरी ल बिछा अउ चुपचाप सो ।
बर्तन धोय ला आवे नहीं,
एको बार भात खाय ल तको पावे नहीं ।
रांधे बर ढेरियाथे,
कच्चा साग ल तको चुपे चाप खाथे ।
जल्दी उठ कपडा ल बोर,
थोकन कनिहा ला टोर ।
बाल्टी कपड़ा धर पोछा लगा,
बड़ काम हे चल जल्दी नहा।
अब कोंन ल रोब देखाबे,
बिहिनिया चाय ल तको खुदे बनाने ।
अध् चूरे खाना ल खाथे,
गोंदलि काटथे त आँशु बोहाथे।
✒अनपढ कवि
लोकनाथ सेन(अलकरहा)
ब्लॉग आर्काइव
गुरुवार, 24 दिसंबर 2015
घर वाली जब मइके जाथे
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