कविताओं का सफ़र
जीवन का हमसफ़र
मिट्टी में खेलते बच्चे
घर हैं जिनके कच्चे
जरा उनके चेहरे को देखो
उनसे जीवन जीना सीखो
मिटटी से सनी है काया
जीवन धुप में कहीं नहीं छाया।
गरीबी की क्या है परिभाषा
दो वक्त की रोटी की अभिलाषा
महलों के सपने न कभी देखे
गांवों की गलियों में हमने सीखे
सपनों की दुनियां बड़ी सुहानी
रातें काटती जहा रूहानी।
बचपन का था एक सपना
मिट्टी का इक घर हो अपना।
महलों के न देखे सपने
सिला दे कोई फटे कपडे।
आंशुओं का शैलाब
जीवन बना अभिशाप
फिर भी नहीं कोई गम
निश्छल निराकार हैं हम ।
✒लोकनाथ सेन "लोकू"
चंडी पारा कोनारी
जीवन का हमसफ़र
मिट्टी में खेलते बच्चे
घर हैं जिनके कच्चे
जरा उनके चेहरे को देखो
उनसे जीवन जीना सीखो
मिटटी से सनी है काया
जीवन धुप में कहीं नहीं छाया।
गरीबी की क्या है परिभाषा
दो वक्त की रोटी की अभिलाषा
महलों के सपने न कभी देखे
गांवों की गलियों में हमने सीखे
सपनों की दुनियां बड़ी सुहानी
रातें काटती जहा रूहानी।
बचपन का था एक सपना
मिट्टी का इक घर हो अपना।
महलों के न देखे सपने
सिला दे कोई फटे कपडे।
आंशुओं का शैलाब
जीवन बना अभिशाप
फिर भी नहीं कोई गम
निश्छल निराकार हैं हम ।
✒लोकनाथ सेन "लोकू"
चंडी पारा कोनारी

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