ब्लॉग आर्काइव

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

इंसान‍ित

इंसानियत आज भी
कहीं जींदा है,
ये देख के मन
खुस होता है,
हम तो घर में सोते है
कोई आज भी
खुले आसमान में
रात भर जागके रोता है।

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