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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

कविताओ का सफ़र

कविताओ का सफ़र
कब रुका है कब थमा है,
ये तो हर युग में बस चलते चला है।
न थाम सकी इसकी प्रवाह को
अंग्रेजों की वो दरिंगगी।
न थाम सका इसके प्रवाह को
भागीरथी की महामनि।
न थाम सका इसके प्रवाह को
दुर्योधन की दाह लीला।
न थाम सका इसके प्रवाह को
कंश की कंठक लीला।
न रुकेगा न थमेगा
बस चलते चलेगा ।
धरती कांपी काया बदली
मंदिर गिरी मस्जिद बनी।
न कभी रुकी है न कभी थमी है
ये कलम रूपी तलवार बस चलते चली है।
कई बार अवरोध आये पर
गिरे वो अपने घुटनों पर।
आदि से अनंत तक
युगों के पतन तक
न कभी थमी है न कभी रुकी है
कविताओं कई पवित्र धारा बस चलते चली है।👏
लोकनाथ सेन

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