ब्लॉग आर्काइव

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

शराबी... आसू कविताएं 001

हाल बने हे,
चाल बिगड़ गेहे,
मया के मारे,
सुरताल बिगड़ गेहे |
गारी चालीस धका धक्,
बाहरी, बेलन ठका ठक |

जिनगी ल जी लेबो
थोक थोक पि लेबो |

दारू ल पी,
थोकन बने जी |

उतरना क्या सीढ़ी है,
हमने थोड़ी सी पि ली है,
हमने मुह मोड़ा कब था,
याद नहीं पीना छोड़ा कब था |

सराब रोज पीजिये,
मजे मव जिजिये,
जिंदगी 2 दिन की है,
सुख और दुःख सब सामिल है।

जिंदगी 2 दिन जीती नहीं
सराब जिंदगी पीती नहीं,
हम तो कविताओ के नशे में है,
सराब बिना पिए ही मजे में है |

तोर भौजी पिट डरही,
कुटेला रोठ पड़ही,
कविता तक ही मोर गोठ हे सिमित
घर के दुवारी हरे मोर लिमिट |

नई पिने वाला के यही हाल होथे,
बिना पिए घर में हाल बेहाल होथे,
पी के तो देख मेरे भाई,
बीवी से कभी नहीं होगी लड़ाई |

पिने वाले तो पीके लिखे
न पिने वाले भी नशे में दिखे 💐💐

छमा चाहेंगे
हमें नशा शराब का न कभी लगा है और न लगेगा,
नशा कविताओ का ना जाने कब फटेगा |

चढ़ गे सबो झन ल,
बिहिनिया के उतारा ल बचा
जतका पिए पहिली वोला पचा |

मोला का पता रिश,
मेडम मन ल तको नशा रिश
थोकन होवे चाहे जादा,
पता नई चलिश कति गिश |
 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें