ब्लॉग आर्काइव

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

आंशू कवि 03

(1)
मैं खुद भी संगठन और
प्रबंधन के बिच पीस रहा हूँ
ऑफिस के चक्कर में
एड़ियां घीस रहा हूँ
दिल के कराह को
कविताओ में लिख रहा हूँ ।

(2)
बुघार धर लेहे
सुधार कर लेहे
मोर गोसइन ताको
ये पागलपन ल स्वीकार कर लेहे |

(3)
आपकी एक आह पर
जहाँ में हाहाकार हो जायेगा
आप जो मुस्कुराये
तो बगिया हो जायेगा
आँशु जब गिरे आपके
तो समंदर बनजायेगा
  |

(4)
नए नवेले कवियों
का ये है मेला
माटीपुत्र को
हमने भी धकेला ।
माटी के लाल को नमन
समूह की और से अभिनन्दन
 

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