(1)
मैं खुद भी संगठन और
प्रबंधन के बिच पीस रहा हूँ
ऑफिस के चक्कर में
एड़ियां घीस रहा हूँ
दिल के कराह को
कविताओ में लिख रहा हूँ ।
(2)
बुघार धर लेहे
सुधार कर लेहे
मोर गोसइन ताको
ये पागलपन ल स्वीकार कर लेहे |
(3)
आपकी एक आह पर
जहाँ में हाहाकार हो जायेगा
आप जो मुस्कुराये
तो बगिया हो जायेगा
आँशु जब गिरे आपके
तो समंदर बनजायेगा |
(4)
नए नवेले कवियों
का ये है मेला
माटीपुत्र को
हमने भी धकेला ।
माटी के लाल को नमन
समूह की और से अभिनन्दन |
मैं खुद भी संगठन और
प्रबंधन के बिच पीस रहा हूँ
ऑफिस के चक्कर में
एड़ियां घीस रहा हूँ
दिल के कराह को
कविताओ में लिख रहा हूँ ।
(2)
बुघार धर लेहे
सुधार कर लेहे
मोर गोसइन ताको
ये पागलपन ल स्वीकार कर लेहे |
(3)
आपकी एक आह पर
जहाँ में हाहाकार हो जायेगा
आप जो मुस्कुराये
तो बगिया हो जायेगा
आँशु जब गिरे आपके
तो समंदर बनजायेगा |
(4)
नए नवेले कवियों
का ये है मेला
माटीपुत्र को
हमने भी धकेला ।
माटी के लाल को नमन
समूह की और से अभिनन्दन |

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