ब्लॉग आर्काइव

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

टूहूॅं दिखा दिए न

टूहूँ दिखा दिए न
टूहूँ दिखा दिए ग,
हमन ल टूहूँ दिखा दिए न ।

बड़ निक लागिश तोर गोठ,
फेर हमन ल तै, लबरा बना दिए न।
टूहूँ दिखा दिए ग,
हमन ल टूहूँ दिखा दिए न ।

बड़ मीठ मीठ गोठ ले तै,
हमन ल मूरख बना दिए न ।
मुरख बना दिए ग,
हमन ल तै, मुरख बना दिए न।
टूहूँ दिखा दिए ग,
हमन ल टूहूँ दिखा दिए न ।

तोर भरोसा म बइठ के हमन,
बड़ आस ल पालेन ग,
बड़ आस ल पालेन।
किस्मत फुटन लगिस त,
माथा धर के रोएन ग,
माथा धर के रोएन न।
टूहूँ दिखा दिए ग,
हमन ल टूहूँ दिखा दिए न ।

गुणवत्ता के नाम धरा,
गुणवत्ता वर्ष मनायेन ग,
गुणवत्ता वर्ष मनायेन ।
गुणवत्‍ता वर्ष मनायेन न ।
शिक्षाकर्मी नाम धरायेन,
सबो काम ल बिसारेन ग,
सबो काम ल बिसारेन न ।
टूहूँ दिखा दिए ग,
हमन ल टूहूँ दिखा दिए न ।

पढ़ई लिखई ल छोड़ के हमन,
मध्‍यान्‍ह भोजन बनायेन ग,
मध्‍यान्‍ह भोजन बनायेन न ।
घर म खाये बर दाना नई ये,
वेतन बर तरसेन ग,
वेतन बर तरसेन न ।
टूहूॅं दिखा दिए ग,
हमन ल टूहूॅं दिखा दिए न ।

आनी बानी दवई ल धरके हमन,
खोर गली म घुमेन ग,
खोर गली म घुमेन न ।
घर बिमार लईका बर,
दवई पानी बर तरसेन ग,
दवई पानी बर तरसेन न ।
टूहूॅं दिखा दिए ग,
हमन ल टूहूॅं दिखा दिए न ।

पेपर म बड़ हेडिंग अईस,
जइसे तै, करोड़पति बना दिये न,
हमन ल करोड़ पति बना दिये ग ।
वेतन बर हर महिना हमन,
गली खोर छुछवायेन ग,
गली खोर छुदवायेन न ।
टूहूॅं दिखा दिए ग,
हमन ल टूहूॅं दिखा दिए न ।

✒ अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन "लोकु"
बलौदा बाजार

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

घर वाली जब मइके जाथे

घर वाली जब मइके जाथे,
त गोसिया ल रई रई के सुरता आथे ।
साग भात म अबड़ भेद निकालथे,
तेन चुपे चाप जरहा रोटि अउ भात ल खाथे ।
अपन हाथ म कपड़ा ल धो,
कथरी ल बिछा अउ चुपचाप सो ।
बर्तन धोय ला आवे नहीं,
एको बार भात खाय ल तको पावे नहीं ।
रांधे बर ढेरियाथे,
कच्चा साग ल तको चुपे चाप खाथे ।
जल्दी उठ कपडा ल बोर,
थोकन कनिहा ला टोर ।
बाल्टी कपड़ा धर पोछा लगा,
बड़ काम हे चल जल्दी नहा।
अब कोंन ल रोब देखाबे,
बिहिनिया चाय ल तको खुदे बनाने ।
अध् चूरे खाना ल खाथे,
गोंदलि काटथे त आँशु बोहाथे।
✒अनपढ कवि
लोकनाथ सेन(अलकरहा)

कविताओ का सफ़र

कविताओ का सफ़र
कब रुका है कब थमा है,
ये तो हर युग में बस चलते चला है।
न थाम सकी इसकी प्रवाह को
अंग्रेजों की वो दरिंगगी।
न थाम सका इसके प्रवाह को
भागीरथी की महामनि।
न थाम सका इसके प्रवाह को
दुर्योधन की दाह लीला।
न थाम सका इसके प्रवाह को
कंश की कंठक लीला।
न रुकेगा न थमेगा
बस चलते चलेगा ।
धरती कांपी काया बदली
मंदिर गिरी मस्जिद बनी।
न कभी रुकी है न कभी थमी है
ये कलम रूपी तलवार बस चलते चली है।
कई बार अवरोध आये पर
गिरे वो अपने घुटनों पर।
आदि से अनंत तक
युगों के पतन तक
न कभी थमी है न कभी रुकी है
कविताओं कई पवित्र धारा बस चलते चली है।👏
लोकनाथ सेन

दिल की बात

जब उससे बात होती है,
एक एहसास दिल में होती है ।
दूर होके भी पास होती है,
जब तेरी एहसास साथ होती है।
तू दूर रहे या पास,
हर पल तू होती है मेरे लिए खास ।
जीवन में एहसास तेरा,
जीवन नाव का पतवार मेरा ।
मेरी सांसो की तू कड़ी है,
आँखों में समाये मोती की लड़ी है ।
दूर होके हो जाता हूँ मैं सुना,
तेरे बिन मेरा जीवन है अधूरा ।
बस इंतजार में रहता हूँ हरपल,
तेरे एहसास से बढ़ रहा मेरा जीवन कलकल।
एक आहट से तेरी,
सांसे चल उठती है मेरी ।
जो न हो तेरा एहसास,
थम जाये मेरा सारा जीवन आज ।
न जाने कौन सी वो घडी थी,
जब तू मेरे जीवन दरवाजे पर खड़ी थी ।
वो दिन था जब मैं केवल जिन्दा था,
तब मैं एक पिंजरे का परिंदा था ।
जीवन का एहसास दिलाया तूने,
जीने का अंदाज सिखाया तूने ।
कर्ज तेरा है मेरे जीवन पर,
फर्ज तू कहती है इसे सजन पर ।
ना जाने क्या है मेरे पूण्य,
जो तू मुझे मिली है अमूल्य ।
मेरी जीवन संगनी अन्नू की यादो में ...
अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन(अल्करहा)
मो 9977580623

हाईकांशू 001

(1)
असमानता
देश को हिस्सों
में है बांटता 👍🏻
(2)
विचारों के मंच में
विचारवानों का अभिनन्दन,
जीवन परिवर्तन हो जाये
बस इतना समर्थन 👏👏

(3)
नभ है सम
परिस्थिति विषम
ले चले हम 🏃🏻🏃🏻🏃🏻🏃🏻

(4)
आसमान के
चमचमाते तारे
विरही सारे

(5)
मन की बात हैं
हर पल जिसके साथ है
जीवन बगिया में
बस किसी का इंतजार है

(6)
तुकबंदी की शाम है
नशे में हर आम है
नशा कोई ऐसा वैसा नहीं,
ये कविताओं का जाम है 🙏🏻🙏🏻

(7)
कवित्त एक
सागर का गागर
वर्षा सावन🙏🏻

(8)
सौभाग्य का ये
दुर्भाग्य जीवन में
अंतर्मन में ।

(9)
लेखनी की ये
लिखावट की कला
जैसे अबला

आंशू कवि 06

(1)
आरजू किसी की
कोई क्या समझ पायेगा
ये मतवालों का मंच हैं
कोई और क्या समझ पायेगा |
(2)
कंप्यूटर में टाइपिंग
कराय ला आथे
आनी बानी के
गोठ ला सुनाथे
नई जानव मतलब
तभो ले रटवाथे |

(3)
शब्दों की जाल
कवियों का कमाल
जी का जंजाल |

(4)
समाज सेवा
परोपकार देवा
है जान लेवा |

(5)
अभिनन्दन
का क्रंदन सुनके
रोये जीवन 👏

(6)
पांच रुपया के जहर
बर पइसा नई हे,
पचास रुपया
दवाई बर कहा पाहू
मोरे पेंट चिरहा हे
कोन कोन ला
दिखाहु 🙏🏻🙏🏻
 
 
 

हाईकू 001

(1)
शब्दों की गंगा
लेखनी की ये नाव
और जमाव |
(2)
ये हाइकू है
शब्दों का जाल
देखो कमाल |

(3)
छाप छोड़ेंगे
हम कुछ अपना
लोकु जपना |

(4)
ये समन्दर
की लहरों को देखो
इनसे सीखो |

(5)
भाव आभाव
जीवन धुप छाव
जीवन नाव

(6)
लेखनी चली
मन भावन बनी
शब्दों की लड़ी |

(7)

भाव अभाव
मिले है धूप छाँव
जीवन नाव
(8)
बेटी का प्यार
जाने जग संसार
गर्वित भार
(9)
बिटिया ब्याही
सूना घर आँगन
याद दिलाये
(10)
नींद सताथे
दिन रात ऊंघाथे
सुतेब जाथे।
(11)
नींद में रेंगे
कोनो ल नई देखे
आँखि ल चेपे
(12)
ले ले उधार
शब्द शैली सुधार
प्रेम बुखार
(13)
भारतीयता
मैं से हम में आता
भाग्य विधाता |
(14)
भारत माता
चरण सुख पता
तू मेरी माता |
(15)
मैं हिंदुस्तानी
रक्त अर्पण ठानी
भरी जवानी
(16)
व्हाट्सअप
जम्मो कारज ठप्प
कहे सेटप
(17)
मूर्धन्यता से
धन्य की ओर चला
सबने छला |
(18)
आईडिया में
आया माया का जाल
जी का जंजाल |

आंशू कवि 05

(1)
माया की महिमा बड़ी अपार
रो रो कर मचाये हाहाकार |
(2)
ना दिखी कोई राह
ना जाने किस बात की थी चाह
हर ओर बस करते गुमराह |
(3)
माया की माया अपरंपार
मच गया हाहाकार
नारी शक्ति की उबाल
आ जाये ना भूचाल👏

(4) 
सम्हाला है जमाना
तेरे सम्हालने से
जमाने ने रंग बदला
तेरे बदलने से
इस दुनिया ने तो
सीखा ही न था
मुस्कुराना
सीखा ठहाका लगाना
बस तेरे मुस्कुराने से 🙏🏻🙏🏻
 

आंशू कवि 04

(1)
कोई गम आपको छू न पायेगी
हमारे साथ रहोगी तो
मुस्कुराना सिख जाओगी
जब उदास रहोगी तो
याद करना इस अनपढ़ को
फिर हस्‍ते हंस्‍ते रोने लग जाअोगी |
(2)
आरी हो या आरा
कट जाये रात सारा
फिर ना यूँ दुखी
होना आप दुबारा |

(3)
फ्री हिट की बात क्या
दिन और रात क्या
जमाने में जीना सीखा
अब गम की औकात क्या  |

(4)
हम बारिस भी खूब है
भीगने का मजा देते है
और जो मजा ना ले
उसे नाकों वाली सजा देते है  |

(5)
सुबह हुआ शाम हुआ,
दिन बदलता गया,
बदनाम होता गया ।
नाम की परवाह,
नहीं रही अब हमको,
बदमानों की लिस्ट में,
मेरा नाम आम हुआ ।
 

Hmse kyaa sikhoge

Hmse kyaa sikhoge
hme to duniya ne sikhaya hai.
Wo to situation ki demand
wali kavita hai jo achanak se
mere dimag me aaya hai.
Hume to phle bhi
kuch ni aata tha
aur na ab aaya hai.
Bhid bhad wali duniya me
Mere akelepan ne sikhaya hai

आंशू कवि 03

(1)
मैं खुद भी संगठन और
प्रबंधन के बिच पीस रहा हूँ
ऑफिस के चक्कर में
एड़ियां घीस रहा हूँ
दिल के कराह को
कविताओ में लिख रहा हूँ ।

(2)
बुघार धर लेहे
सुधार कर लेहे
मोर गोसइन ताको
ये पागलपन ल स्वीकार कर लेहे |

(3)
आपकी एक आह पर
जहाँ में हाहाकार हो जायेगा
आप जो मुस्कुराये
तो बगिया हो जायेगा
आँशु जब गिरे आपके
तो समंदर बनजायेगा
  |

(4)
नए नवेले कवियों
का ये है मेला
माटीपुत्र को
हमने भी धकेला ।
माटी के लाल को नमन
समूह की और से अभिनन्दन
 

अपनेपन का दुलार।

कविओं के इस मेले में
हम भी चले ठेले में
कविता का पाठ पढ़ाने
लोगों को अपना दुखड़ा सुनाने
चलो चले उस ओर
भोर दिखायी दे जिस ओर
अपनों का प्यार
अपनेपन का दुलार।
माँ की ममता
पापा का प्यार
बहन की लाड
भाई से तकरार
हम भी सुनाये कुछ बातें
कहीं न बीत जाये रातें।
लोकनाथ सेन लोकू
सहा शि पं
चंडी पारा कोनारी

आंशू कवि 02

(1)
आप मन के आशीर्वाद हे
मया के बरसात हे
तुहरे दया कृपा से
मोर व्हाट्स अप्प के दुकान आबाद हे|
(2)
हम ला तो सोशल मीडिया के बीमारी हे
कविता पढ़े के लाचारी हे
लिखे ला आतिश ता
पूरा इतिहास लिख देतेव
मोर कलम बड़ा अत्याचारी हे |

(3)
फेविकॉल के मजबूत जोड़
दुश्मन भी ना पाये तोड़
टंगिया बसला के बात छोड़
पथरा म मुड़ी ला फोर |

(4)
वर्मा जी ये आँशु कवी का होथे
जेखर कविता ला सुनके सब्बो झन रोथे
कविता के बात ला नि समझे
फेर कवि जैसे बात ला घोरथे |
 

जबले मोबाइल आहे

(1)
ओहो में डरा गे रहेंव
सकपका गे रहेंव
मोबाइल ला फेक के
घटिया म टंगा गे रहेंव |
(2)
जबले मोबाइल आहे
मोर आँशु नि पोछहे
मोर मेडम पूछथे
काखर करा गोठियाथच
रात दिन चिचियाथच
मोबाइल छोड़के
टोकन मोरो तीर मा आ
मोबाईल वाली के नाम बता
का वोला बतावा
का दुख ला सुनावा
मोबाइल एक प्रेतात्म ये
ओला कैसे समझावा |

गरीबी की परिभाषा

कविताओं का सफ़र
जीवन का हमसफ़र
मिट्टी में खेलते बच्चे
घर हैं जिनके कच्चे
जरा उनके चेहरे को देखो
उनसे जीवन जीना सीखो
मिटटी से सनी है काया
जीवन धुप में कहीं नहीं छाया।
गरीबी की क्या है परिभाषा
दो वक्त की रोटी की अभिलाषा
महलों के सपने न कभी देखे
गांवों की गलियों में हमने सीखे
सपनों की दुनियां बड़ी सुहानी
रातें काटती जहा रूहानी।
बचपन का था एक सपना
मिट्टी का इक घर हो अपना।
महलों के न देखे सपने
सिला दे कोई फटे कपडे।
आंशुओं का शैलाब
जीवन बना अभिशाप
फिर भी नहीं कोई गम
निश्छल निराकार हैं हम ।
✒लोकनाथ सेन "लोकू"
चंडी पारा कोनारी
(1)
अमीरों की रोटी
गरीबों की बोटी
अमीर लूट के खाते हैं
गरीब लुटाते रह जाते हैं
थाली में रोटियां
आती है गिनकर
अमीर सब्जियों की
कटोरियाँ गिनते रह जाते हैं ।

(2)
गरीबी तो एक दुआ है
चैन की शाम और सुबह है
करोडो की है संपत्ति
ये रंग लीला चार दिन की
दौलत की दुनिया में रहकर
गरीबों की आह में पलकर
कौन रह पाया है सुखी
जीवन भर रह गए दुखी |

शिक्षाकर्मी शिक्षक कब कहलायेगा

गरीबी क्या है कोई मुझको भी बताये
गरीबी की क्या परिभाषा कोई समझाये।
मैं गरीब हूँ या अमीर कुछ समझ न पाया
शिक्षा कर्मी है नाम हो गया हूँ बदनाम
बिकती है मेरी इज्जत सरे आम
पानठेला होटल और दुकानों में सरेआम
होता हूँ शर्मिंदा हर शाम
करता हूँ पुरे अपने काम
होकर भी बदनाम
कोई बता दे गरीब या अमीर ये समझादे
काम करके वेतन हर माह दिलादे
गरीबों के पास है अन्न, अमीरों के घर धन्न
मेरी स्थिति कोई बतलाये
सही समय पर 2 रोटी दिलाये।
शासन के बड़े हैं चोचले
हमें कहतें है कानों में रुई खोंच ले
संगठन के लाले 15 हमने पाले
उनका घर आलिशान मेरा घर हुआ शमसान।
इंसानों की एक प्रजाति
सबको ज्ञान दे जाती
कोई समझाये मुझको भी
वेतन समय पर क्यों नहीं आती।
डॉक्टर हूँ या हूँ डाकिया
कौन से काम मैंने ना किया
इंतजार रहता है हर पल
बाबू कहता है कल
वो कल ना जाने कब आएगा
शिक्षाकर्मी शिक्षक कब कहलायेगा💀
लोकनाथ सेन "लोकू"
सहा शिक्षक पं
चंडी पारा कोनारी

जिंदगी एक ज्वाला

नहीं सर जिंदगी एक ज्वाला है
मुस्किलों से हमारा हरपल पाला है
जीवन में कोई न जाने नाम हमारा
कर्म से मेरे जगमगाये संसार सारा |
गरीबी से शुरू हुआ जीवन रथ
बचपन में लिया हमने सारा जग मथ
गुण दुर्गुण पाये प्रकृति प्रदत्त
अपना जीवन है अब अग्निपथ अग्निपथ |

कालचक्र...

कालचक्र न रुका है न थमा है
निरंतर चलते चला है
निशिदिन प्रकृति निराकार
होंगे हर सत्य साकार
इंसान है तू बस इंसानियत में रह
इस दुनिया का राहगीर है मालिक न बन
देख तेरा संसार का असली मालिक ऊपर बैठा है सालिक🔥
लोकनाथ से

अंतहीन लिस्ट

अंतहीन लिस्ट निकलते जायेगा
अंधे प्रशासन को कौन समझायेगा।
अंग्रेजो की अंगरेजी सर चढ़कर बोली
हिंदी मातृ भाषा शिस्कियों में रोली।
न जाने कब इतिहास मुह खोलेगा
अंग्रेजो के पोल कोई भारतीय खोलेगा।
इंतजार है उस कल का
विश्व गुरु के अनल का👏👏
लोकनाथ सेन

विश्व गुरु....

विश्व गुरु कहलाते थे हम
ज्ञान प्रवाह बहलाते थे हम ।
वो नालंदा और तक्षशिला
धूल धूसरित मिटटी में मिला ।
आर्यभट्ट और रामानुज की जननी
हर सूत्र और अंक है जनमी।
शुन्य का जहाँ जन्म हुआ
मानवता का पुनर्जन्म हुआ।
वसुधैव कुटुम्बकम् का शब्द दिया
राम कृष्ण ने जहा जन्म लिया।
वो धरती सुहानी मस्तानी थी
हर मुश्किल में सीना तानी थी।
बौद्ध विवेकानंद जैन मुनि सन्याशी थे
हरिश्चंद्र राम और शिवाजी वनवासी थे।
काशी की वो पावन धरती
लक्ष्मी जहां झाँसी पर मरती।
भगत मंगल का खून बहा
गांधी ने चुपचाप सबकुछ सहा।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
मिट्टी वो भारत कहलाई ।
आक्रांताओं के चोटों को सहकर
जीता जग अपने बलपर लड़कर।
विश्व को राह दिखाएंगे हम
पुनः विश्व गुरु कहलायेंगे हम।
वंदे मातरम्।।।
लोकनाथ सेन "लोकू"
चंडी पारा कोनारी

दीपावली की सुभकामनाएं।

मन
को भाये
उजियाला
जग में लाये
बेगानों के घर
दीप आज जलाएं।
दीपावली की सुभकामनाएं।
✒लोकनाथ सेन
बलौदा बाजार

देवरी मनाबो।

आ बइठ तीर में
देवारी मनाबो।
दिया में बाती लगा
दिया जलाबो।
फटाका होंगे महंगा
आ चुरचुटिया जलाबो।
कुछु नई ले सकन हम गरीब
चल दूनो मया पिरित ले देवरी मनाबो।

दीयों की दीवाली

दीयों की दीवाली आई है
खुशहाली भरपूर लायी है।
अपना पराया भूल के जग में
उजियारा फैलाये हम ।
भ्रष्टाचार और लाचारी के
साम्राज्य को दूर भगाए हम।
मानवता हो धर्म हमारा
ऐसा दिया जलाये हम ।
इंसानियत फिर जाग उठे
ऐसा त्यौहार मनाये हम ।
💐 दीपावली की सुभकामनाएँ
✒ लोकनाथ सेन
🏡 बलौदा बाजार
📱 9977580623

बड़ जतन के वेतन

बड़ जतन ले वेतन आहे
लोग लाइक घरवाली मुस्काहे।
देवरी में फटाका ल फोर
अगले महीना के बचत ल छोर।
आबंटन होंगे हे खतम
करले अब थोकन जतन।
देवरी मना फेर पइसा बचा
झन जादा हाहाकार मचा।
आबंटन ल अब अगोर लेबे
एकादसी में फटाका फोर लेबे।
शिक्षा कर्मी बने हच तोर करम
आबंटन आहि ये हरे बड़े भरम।
आबंटन जब तक आहि
हर दुकानदार फेर गुर्राही।
आबंटन के सिस्टम हे बेमानी
हर महिना होथे परेशानी।
आबंटन जब होही खतम
घर दुवारी के होही जतन।
दू लाख ल मुर्ख बनाये
50झन नेता कहाये।
जब टुटही हमर भरम
गद्दार रोही पूरा जनम।
जब आबंटन सिस्टम बंद कराहु
तब हर महिना वेतन ला पाहु।
घरवाली ल मुस्करावत पाहु
लोग लइका संग बने देवारी मनाहु।
हैप्पी देवारी 😂😭
✒ लोकनाथ सेन
🏡 पुरानी बस्ती बलौदा बाजार
📱 9977580623

Nursh...

Ma ka pyar bahan ka dular
Apna pan laye har bimari dur bhagaye
Na koi rista na koi nata
Fir bhi sabhi ka dard samajh aata.
Bimari ho jaye rafuchakkar
Doctor diske bina hai ghanchakkar.
Apna na hoke bhi jisme apna pan samaye,
Vo nari shakti jag me narsh kahaye.

शिक्षा का राजनीतिकरण...

शिक्षा का राजनीती ने
क्या हाल कर दिया,
स्कूल हुआ सुनसान,
शिक्षा को बदहाल कर दिया।
गौरवपूर्ण पद को,
राजनीती ने बदनाम कर दिया।
समाज तंत्र जिस पर टिका था,
जिस ज्ञान से इतिहास मिला था,
आज वो इतिहास आ रो रहा है,
देखो आज शिक्षानीति सो रहा है।
देख जमाने ने रंग है बदला,
शिक्षको पर हो रहे है हमला।
समझ न आये कौन है दोषि,
चहु और है छायी खामोसी।
अब तो समझो जगत प्रणेता,
शिक्षक हो ना बनो राजनेता।
संसार चिरनिद्रा में सोई है
तुमने अपनी इज्जत खुद खोयी है😥😥
✒लोकनाथ सेन
बलौदा बाजार

इंसान‍ित

इंसानियत आज भी
कहीं जींदा है,
ये देख के मन
खुस होता है,
हम तो घर में सोते है
कोई आज भी
खुले आसमान में
रात भर जागके रोता है।

Bas Tu Salamat Rahe

Dil ke kone se,
jab pyar kisi se hota hai,
Bichhadne ke gam se,
Dil sath hokar bhi rota hai.
Koi tanha rota hai,
To koi bhid me khun ke aanshu rota hai.
Na chaha tha vafai,
Bas ek mannat this na kare tu bevafai.
Dil ke tukade tune hajar kiye,
Meri ijjat har gali nilam kiye.
Bevafa ham tumhe na kah payenge,
Apni vafai me kami khojte rah jayenge.
Dil ke aanshu dil me sukh jati hai,
Aye saman jab yad Teri aati hai.
Jee to ham pahle bhi rahe the,
Par Teri kami ne ab jina Sikha diya.
Aanshu gira bahut roye the,
Par tere dard ne dil se Rona sikha diya.
Kya khub hota hai pyar ek nagma.
Aadami se insan hai janma.
Teri khusi ke liye
Aaj bhi ham har mandir me jate hai.
Koi glti hogi hamari bhi,
Har yaad pe Teri hm najar jhukate hai.
Purane khavo se yado ke lahu bas bahta rahe,
Par ek chaht ki tu sada khus rahe
✒LN Sen

मेरी कव‍िता

ना खोल उस दरवाजे को
जहा मेरा अतीत छुपा है,
मेरी हर कविता में,
लोगों को मेरा प्यार दिखा है,
कोई तो कह दे मुझे भी,
आज राह चलते तेरा चाँद दिखा है ।

शाम का सलाम

कविताओं के इक सफ़र में,
कोई कवि मेरी भी कविता लिख दे,
मेरा जीवन इक कोरा कागज,
इसमें भी कोई कहानी लिख दे ।
कविता नहीं तो कोई कहानी लिख दे,
जो याद है वो मुहजुबनि लिख दे ।
मेरी आँखों ने देखा एक सपना था,
बस वही तो मेरा अपना था ।
✒लोकनाथ सेन "लोकू"
की और से सभी को शाम का सलाम

शराबी... आसू कविताएं 001

हाल बने हे,
चाल बिगड़ गेहे,
मया के मारे,
सुरताल बिगड़ गेहे |
गारी चालीस धका धक्,
बाहरी, बेलन ठका ठक |

जिनगी ल जी लेबो
थोक थोक पि लेबो |

दारू ल पी,
थोकन बने जी |

उतरना क्या सीढ़ी है,
हमने थोड़ी सी पि ली है,
हमने मुह मोड़ा कब था,
याद नहीं पीना छोड़ा कब था |

सराब रोज पीजिये,
मजे मव जिजिये,
जिंदगी 2 दिन की है,
सुख और दुःख सब सामिल है।

जिंदगी 2 दिन जीती नहीं
सराब जिंदगी पीती नहीं,
हम तो कविताओ के नशे में है,
सराब बिना पिए ही मजे में है |

तोर भौजी पिट डरही,
कुटेला रोठ पड़ही,
कविता तक ही मोर गोठ हे सिमित
घर के दुवारी हरे मोर लिमिट |

नई पिने वाला के यही हाल होथे,
बिना पिए घर में हाल बेहाल होथे,
पी के तो देख मेरे भाई,
बीवी से कभी नहीं होगी लड़ाई |

पिने वाले तो पीके लिखे
न पिने वाले भी नशे में दिखे 💐💐

छमा चाहेंगे
हमें नशा शराब का न कभी लगा है और न लगेगा,
नशा कविताओ का ना जाने कब फटेगा |

चढ़ गे सबो झन ल,
बिहिनिया के उतारा ल बचा
जतका पिए पहिली वोला पचा |

मोला का पता रिश,
मेडम मन ल तको नशा रिश
थोकन होवे चाहे जादा,
पता नई चलिश कति गिश |
 

पद नहीं प्रतिष्‍ठा है |

अपना पराया कोई न जग में,
सबके लिए बंधुत्व मन में ।
शिक्षाकर्मी हित हो नभ् में,
ज्ञान का सम्मान हो रन में ।
ले चले ज्ञान नौका को,
मझधार से हम पार कर ।
लेखनी को अपने धार कर,
जय विजय का सत्कार कर ।
सबका हित है, हमने माना,
नहीं चलेगा अब मनमाना।
भूली बिसरी बातेँ छोडो,
नए दिशा में राह मोड़ो ।
सबको अपना मान लिया,
जनमत ने स्वीकार किया।
ज्ञान की गगरी लिये,
चुनौतियोंओ का चादर सिये।
संगठन की शक्ति अपार,
ले चले नौका को पार मझधार ।
सभी को सम्मान मिला,
अपनेपन का भान लिया ।
बहुमत ने स्वीकार किया,
किसी का न तिरस्कार किया।
ये पद नहीं प्रतिष्ठा है,
हर शिक्षाकर्मी की निष्ठा है ।
✒ लोकनाथ सेन
मो 9977580623

हेमलमेट अनिवार्य हुआ...

चेहरा नकाब से ढककर,
चलने वाली महिलाओ,
अब तुम सुन्दर लड़का,
देखने को तरसजाओगे,
हैंडसम चेहरा अब देख न पाओगे ।
नकाब जरूर नहीं था,
चेहरा कोई देखे ये मंजुर नहीं था ।
नही रहेगा अब अंतर,
सर रहेगा हेलमेट के अन्दर।

सिर्फ मेरे लिए....

संगमरमर को तरास्कर बनी है तू
सारी कारीगरी है तेरे लिए,
पर तू है सिर्फ मेरे लिए ।
खुदा ने फूंका है
जान तुझ पत्थर पर,
मेरी जान भी है तेरे लिए
पर तू है सिर्फ मेरे लिए ।
गुलाब की गुलाबी को समेट
बने है तुम्हारे लब,
जहाँ की सारी गुलाबी है तुम्हारे लिए
पर तुम हो सिर्फ मेरे लिए।
समुन्दर की गहराई से भी
गुहारें है तुम्हारे नैन,
मेरे दिल की सारी गहराई है तुम्हारे लिए
पर तुम हो सिर्फ मेरे लिए।
✒लोकनाथ सेन (2006)
बलौदा बाज़ार