ब्लॉग आर्काइव

शनिवार, 26 मार्च 2016

प्रकंद या राइजोम (Rhizome) के ऊपर वल्कल पत्र और नीचे झकड़ा जड़ें होती हैं। पत्र के कोणों की कलियों से अंकुर निकलकर हवा में चले जाते हैं। जड़ें प्रमुख राइजोम से अलग होकर वंशविस्तार करती हैं। इसके उदाहरण अदरख, हल्दी और फर्न है

कंद या ट्यूबर (Tuber) वल्कलपत्रों के कोणों में कंद लगता है। कंद का तना फूला हुआ रहता है। इसमें खाद्य संचित रहता है। आलू इसका अच्छा उदाहरण है। आलू पर कलियाँ या आँखे होती हैं। प्रत्येक आँख एक पौधा उत्पन्न करती है।

गुरुवार, 17 मार्च 2016

मोहब्बत के दिवाने हैं, तुझी से प्यार करते है।
तेरे आसिक पुराने है, तुझे बस याद करते हैं।

मोहब्बत वो नही जो, लोग कुबार्न होते हैं।
मोहब्बत है जिसमें, लोग आबाद होते हैं।

मोहब्बत को युं ही लोग, बदनाम करते हैं।
अपनी ही आबरू को जो, निलाम करते है।

मोहब्बत को ना समझना, जमाने की फितरत है।
मोहब्बत में मिट जाना, ये कैसी जुर्रत है।

मोहब्बत एक तोहफा है, जिससे इजहार करते हैं।
मोहब्बत के उसुलों से पर, हम इनकार करते है।

** अपनढ़
लोकनाथ सेन
मो नं. 9977580623

एक बात कह दू आज तुम्हे
आँखों में बिठा लू आज तुम्हे
तुम एक मौका ही दे दो हमें
तारो में बिठा तू आज तुम्हे।
**अनपढ़

बुधवार, 16 मार्च 2016

हम तुम मिलकर चल रहे,
मिलता सबका साथ।
राहे आसां हो रही,
मिले हाथ से हाथ।
**दोहा**

गुरुवार, 10 मार्च 2016

दोहा

दोहा, मात्रिक अर्द्धसम छंद है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) में १३-१३ मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) में ११-११ मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के आदि में प्राय: जगण (। ऽ।) टालते है, लेकिन इस की आवश्यकता नहीं है। 'बड़ा हुआ तो' पंक्ति का आरम्भ ज-गण से ही होता है.
सम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है अर्थात अन्त में लघु होता है।
उदाहरण-
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।
पंथी को छाया नहीं, फल लागैं अति दूर ।।

मुरली वाले मोहना, मुरली नेक बजाय।
तेरी मुरली मन हरो, घर अँगना न सुहाय॥
हेमचन्द्र के मतानुसार दोहा-छन्द के लक्षण हैं - समे द्वादश ओजे चतुर्दश दोहक:
समपाद के अन्तिम स्थान पर स्थित लघु वर्ण को हेमचन्द्र गुरु-वर्ण का मापन देता है. 'अत्र समपादान्ते गुरुद्वयमित्याम्नाय:' यह सूत्र विषद किया है.
मम तावन्मतमेतदिह - किमपि यदस्ति तदस्तु
रमणीभ्यो रमणीयतरमन्यत् किमपि न वस्तु

दोहा एक ऐसा छंद है जो शब्दों की मात्राओं के अनुसार निर्धारित होता है. इसके दो पद होते हैं तथा प्रत्येक पद में दो चरण होते हैं. पहले चरण को विषम चरण तथा दूसरे चरण को सम चरण कहा जाता है. विषम चरण की कुल मात्रा 13 होती है तथा सम चरण की कुल मात्रा 11 होती है. अर्थात दोहा का एक पद 13-11 की यति पर होता है. यति का अर्थ है विश्राम.
यानि भले पद-वाक्य को न तोड़ा जाय किन्तु पद को पढ़ने में अपने आप एक विराम बन जाता है.

दोहा छंद मात्रा के हिसाब से 13-11 की यति पर निर्भर न कर शब्द-संयोजन हेतु विशिष्ट विन्यास पर भी निर्भर करता है. बल्कि दोहा छंद ही क्यों हर मात्रिक छंद के लिए विशेष शाब्दिक विन्यास का प्रावधान होता है.

यह अवश्य है कि दोहा का प्रारम्भ यानि कि विषम चरण का प्रारम्भ ऐसे शब्द से नहीं होता जो या तो जगण (लघु गुरु लघु या ।ऽ। या 121) हो या उसका विन्यास जगणात्मक हो
अलबत्ता, देवसूचक संज्ञाएँ जिनका उक्त दोहे के माध्यम में बखान हो, इस नियम से परे हुआ करती हैं. जैसे, गणेश या महेश आदि शब्द.

दोहे कई प्रकार के होते हैं. कुल 23 मुख्य दोहों को सूचीबद्ध किया गया है. लेकिन हम उन सभी पर अभी बातें न कर दोहा-छंद की मूल अवधारणा पर ही ध्यान केन्द्रित रखेंगे. इस पर यथोचित अभ्यास हो जाने के बाद ही दोहे के अन्यान्य प्रारूपों पर अभ्यास करना उचित होगा. जोकि, अभ्यासियों के लिये व्यक्तिगत तौर पर हुआ अभ्यास ही होगा. 

दोहे के मूलभूत नियमों को सूचीबद्ध किया जा रहा है.

1. दोहे का आदि चरण यानि विषम चरण विषम शब्दों से यानि त्रिकल से प्रारम्भ हो तो शब्दों का संयोजन 3, 3, 2, 3, 2 के अनुसार होगा  और चरणांत रगण (ऽ।ऽ) या नगण (।।।) होगा.

2. दोहे का आदि चरण यानि विषम चरण सम शब्दों से यानि द्विकल या चौकल से प्रारम्भ हो तो शब्दों का संयोजन 4, 4, 3, 2 के अनुसार होगा और चरणांत पुनः रगण (ऽ।ऽ) या नगण (।।।) ही होगा.

देखा जाय तो नियम-1 में पाँच कलों के विन्यास में चौथा कल त्रिकल है. या नियम-2 के चार कलों के विन्यास का तीसरा कल त्रिकल है. उसका रूप अवश्य-अवश्य ऐसा होना चाहिये कि उच्चारण के अनुसार मात्रिकता गुरु लघु या ऽ। या 21 ही बने.
यानि, ध्यातव्य है, कि कमल जैसे शब्द का प्रवाह लघु गुरु या ।ऽ या 1 2 होगा. तो इस त्रिकल के स्थान पर ऐसा कोई शब्द त्याज्य ही होना चाहिये. अन्यथा, चरणांत रगण या नगण होता हुआ भी जैसा कि ऊपर लिखा गया है, उच्चारण के अनुसार गेयता का निर्वहन नहीं कर पायेगा. क्योंकि उसतरह के त्रिकल के अंतिम दोनों लघु आपस में मिलकर उच्चारण के अनुसार गुरु वर्ण का आभास देते हैं. और विषम चरणांत में दो गुरुओं का आभास होता है.

3. दोहे के सम चरण का संयोजन 4, 4, 3 या 3, 3, 2, 3 के अनुसार होता है. मात्रिक रूप से दोहों के सम चरण का अंत यानि चरणांत गुरु लघु या ऽ। या 2 1 से अवश्य होता है.

कुछ प्रसिद्ध दोहे -

कबिरा खड़ा बजार में, लिये लुकाठी हाथ
जो घर जारै आपनो, चलै हमारे साथ

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंछी को छाया नहीं फल लागै अति दूर

साईं इतना दीजिये, जामै कुटुम समाय
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय

विद्या धन उद्यम बिना कहो जु पावै कौन
बिना डुलाये ना मिले, ज्यों पंखे का पौन
*****

छन्द

छन्द संस्कृत वांग्मय में सामन्यतया लय को बताने के लिये प्रयोग किया गया है।[1] विशिष्ट अर्थों में छन्द कविता या गीत में वर्णों की संख्या और स्थान से सम्बंधित नियमों को कहते हैं जिनसे काव्य में लय और रंजकता आती है। छोटी-बड़ी ध्वनियां, लघु-गुरु उच्चारणों के क्रमों में, मात्रा बताती हैं और जब किसी काव्य रचना में ये एक व्यवस्था के साथ सामंजस्य प्राप्त करती हैं तब उसे एक शास्त्रीय नाम दे दिया जाता है और लघु-गुरु मात्राओं के अनुसार वर्णों की यह व्यवस्था एक विशिष्ट नाम वाला छन्द कहलाने लगती है, जैसे चौपाई, दोहा, आर्या, इन्द्र्वज्रा, गायत्री छन्द इत्यादि। इस प्रकार की व्यवस्था में मात्रा अथवा वर्णॊं की संख्या, विराम, गति, लय तथा तुक आदि के नियमों को भी निर्धारित किया गया है जिनका पालन कवि को करना होता है। इस दूसरे अर्थ में यह अंग्रेजी के मीटर[2] अथवा उर्दू फ़ारसी के रुक़न (अराकान) के समकक्ष है। हिन्दी साहित्य में भी परंपरागत रचनाएँ छन्द के इन नियमों का पालन करते हुए रची जाती थीं, यानि किसी न किसी छन्द में होती थीं। विश्व की अन्य भाषाओँ में भी परंपरागत रूप से कविता के लिये छन्द के नियम होते हैं।
छन्दों की रचना और गुण-अवगुण के अध्ययन को छन्दशास्त्र कहते हैं। चूँकि, आचार्य पिङ्गल द्वारा रचित 'छन्दःशास्त्र' सबसे प्राचीन उपलब्ध ग्रन्थ है, इस शास्त्र को पिङ्गलशास्त्र भी कहा जाता है।[3]

इतिहास

प्रचीन काल के ग्रंथों में संस्कृत में कई प्रकार के छन्द मिलते हैं जो वैदिक काल के जितने प्राचीन हैं। वेद के सूक्त भी छन्दबद्ध हैं। पिङ्गल द्वारा रचित छन्दशास्त्र इस विषय का मूल ग्रन्थ है। छन्द की सबसे पहले चर्चा ऋग्वेद में हुई है। यदि गद्य की कसौटी ‘व्याकरण’ है तो कविता की कसौटी ‘छन्दशास्त्र’ है। पद्यरचना का समुचित ज्ञान छन्दशास्त्र की जानकारी के बिना नहीं होता। काव्य ओर छन्द के प्रारम्भ में ‘अगण’ अर्थात ‘अशुभ गण’ नहीं आना चाहिए।

शब्दार्थ

वाक्य में प्रयुक्त अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा-गणना तथा यति-गति से सम्बद्ध विशिष्ट नियमों से नियोजित पद्यरचना ‘'छन्द'’ कहलाती है। छन्दस् शब्द 'छद' धातु से बना है। इसका धातुगत व्युत्पत्तिमूलक अर्थ है - 'जो अपनी इच्छा से चलता है'। इसी मूल से स्वच्छंद जैसे शब्द आए हैं । अत: छंद शब्द के मूल में गति का भाव है।
किसी वाङमय की समग्र सामग्री का नाम साहित्य है। संसार में जितना साहित्य मिलता है ’ ऋग्वेद ’ उनमें प्राचीनतम है। ऋग्वेद की रचना छंदोबद्ध ही है। यह इस बात का प्रमाण है कि उस समय भी कला व विशेष कथन हेतु छंदो का प्रयोग होता था।छंद को पद्य रचना का मापदंड कहा जा सकता है। बिना कठिन साधना के कविता में छंद योजना को साकार नहीं किया जा सकता।

छंद के अंग

छंद के निम्नलिखित अंग होते हैं -
  • गति - पद्य के पाठ में जो बहाव होता है उसे गति कहते हैं।
  • यति - पद्य पाठ करते समय गति को तोड़कर जो विश्राम दिया जाता है उसे यति कहते हैं।
  • तुक - समान उच्चारण वाले शब्दों के प्रयोग को तुक कहा जाता है। पद्य प्रायः तुकान्त होते हैं।
  • गण - मात्राओं और वर्णों की संख्या और क्रम की सुविधा के लिये तीन वर्णों के समूह को एक गण मान लिया जाता है। गणों की संख्या ८ है - यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।) और सगण (।।ऽ)।
गणों को आसानी से याद करने के लिए एक सूत्र बना लिया गया है- यमाताराजभानसलगा। सूत्र के पहले आठ वर्णों में आठ गणों के नाम हैं। अन्तिम दो वर्ण ‘ल’ और ‘ग’ छन्दशास्त्र के दग्धाक्षर हैं। जिस गण की मात्राओं का स्वरूप जानना हो उसके आगे के दो अक्षरों को इस सूत्र से ले लें जैसे ‘मगण’ का स्वरूप जानने के लिए ‘मा’ तथा उसके आगे के दो अक्षर- ‘ता रा’ = मातारा (ऽऽऽ)।
‘गण’ का विचार केवल वर्ण वृत्त में होता है मात्रिक छन्द इस बंधन से मुक्त होते हैं।
। ऽ ऽ ऽ । ऽ । । । ऽ
य मा ता रा ज भा न स ल गा
गण चिह्न उदाहरण प्रभाव
यगण (य) ।ऽऽ नहाना शुभ्
मगण (मा) ऽऽऽ आजादी शुभ्
तगण (ता) ऽऽ। चालाक अशुभ्
रगण (रा) ऽ।ऽ पालना अशुभ्
जगण (ज) ।ऽ। करील अशुभ्
भगण (भा) ऽ।। बादल शुभ्
नगण (न) ।।। कमल शुभ्
सगण (स) ।।ऽ कमला अशुभ

छंद के प्रकार

  • मुक्त छंद का उदाहरण -
वह आता
दो टूक कलेजे के करता, पछताता पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी-भर दाने को, भूख मिटाने को,
मुँह फटी-पुरानी झोली का फैलाता,
दो टूक कलेजे के करता, पछताता पथ पर आता।

काव्य में छंद का महत्त्व

  • छंद से हृदय को सौंदर्यबोध होता है।
  • छंद मानवीय भावनाओं को झंकृत करते हैं।
  • छंद में स्थायित्व होता है।
  • छंद सरस होने के कारण मन को भाते हैं।
  • छंद के निश्चित आधार पर आधारित होने के कारण वे सुगमतापूर्वक कण्ठस्त हो जाते हैं।
उदाहरण -
भभूत लगावत शंकर को, अहिलोचन मध्य परौ झरि कै।
अहि की फुँफकार लगी शशि को, तब अंमृत बूंद गिरौ चिरि कै।
तेहि ठौर रहे मृगराज तुचाधर, गर्जत भे वे चले उठि कै।
सुरभी-सुत वाहन भाग चले, तब गौरि हँसीं मुख आँचल दै॥
अर्थात् (प्रातः स्नान के पश्चात्) पार्वती जी भगवान शंकर के मस्तक पर भभूत लगा रही थीं तब थोड़ा सा भभूत झड़ कर शिव जी के वक्ष पर लिपटे हुये साँप की आँखों में गिरा। (आँख में भभूत गिरने से साँप फुँफकारा और उसकी) फुँफकार शंकर जी के माथे पर स्थित चन्द्रमा को लगी (जिसके कारण चन्द्रमा काँप गया तथा उसके काँपने के कारण उसके भीतर से) अमृत की बूँद छलक कर गिरी। वहाँ पर (शंकर जी की आसनी) जो बाघम्बर था, वह (अमृत बूंद के प्रताप से जीवित होकर) उठ कर गर्जना करते हुये चलने लगा। सिंह की गर्जना सुनकर गाय का पुत्र - बैल, जो शिव जी का वाहन है, भागने लगा तब गौरी जी मुँह में आँचल रख कर हँसने लगीं मानो शिव जी से प्रतिहास कर रही हों कि देखो मेरे वाहन (पार्वती का एक रूप दुर्गा का है तथा दुर्गा का वाहन सिंह है) से डर कर आपका वाहन कैसे भाग रहा है।

छंदों के कुछ प्रकार

दोहा

दोहा मात्रिक छंद है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) चरण में 13-13 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है। उदाहरण -
मुरली वाले मोहना, मुरली नेक बजाय।
तेरो मुरली मन हरो, घर अँगना न सुहाय॥

रोला

रोला मात्रिक सम छंद होता है। इसके विषम चरणों में 11-11 मात्राएँ और सम चरणों में 13-13 मात्राएँ होती हैं। उदाहरण -
यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।
पर-स्वारथ के काज, शीश आगे धर दीजै॥

सोरठा

सोरठा मात्रिक छंद है और यह दोहा का ठीक उलटा होता है। इसके विषम चरणों चरण में 11-11 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है। उदाहरण -
जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन।
करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥

चौपाई

चौपाई मात्रिक सम छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। उदाहरण -
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥

कुण्डलिया

कुण्डलिया मात्रिक छंद है। दो दोहों के बीच एक रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। पहले दोहे का अंतिम चरण ही रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होता है। उदाहरण -
कमरी थोरे दाम की, बहुतै आवै काम।
खासा मलमल वाफ्ता, उनकर राखै मान॥
उनकर राखै मान, बँद जहँ आड़े आवै।
बकुचा बाँधे मोट, राति को झारि बिछावै॥
कह 'गिरिधर कविराय', मिलत है थोरे दमरी।
सब दिन राखै साथ, बड़ी मर्यादा कमरी॥

[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: शब्दों की माला
गीत नहीं है ज्वाला
है पाठशाला
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: बिखरी स्याही
शब्द प्यास बुझती
राह बताती।
✒अनपढ़
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: सीखे जमाना
हमें भी आजमाना
नहीं बहाना।
✒अनपढ़
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: **तांका**
गुनगुनाते
प्रीत गीत है गाते
मन को भाते।
कवित्त ऐसा रस
रहते मदमस्त।
✒अनपढ़
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: जो पियो दूध
बन जाओगे बुद्ध
मतिस्क सुद्ध।
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: दिल टूट के बिखर गया
शब्द मेरे निखर गया।
तोड़ने वाला तोड़ गया
मोहब्बत साथ छोड़ गया।
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: ��������
इतनी खुशी
बर्दास्त नहीं होती
चैन से सोती।
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: मोहब्बत में मरने वालो का
जब भी नाम लिखा जायेगा।
किसी न किसी लकीर में
मेरा नाम भी आएगा।
मजनू ना सही तो क्या हुआ
ये अनपढ़ दीवाना कहलायेगा।
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: हमें तो मोहब्बत की तलाश थी
जरूर तुम में कोई तो बात थी
अँधेरी रांतो में चांदनी की तलाश थी
तेरे हुश्न में जरूर कोई बात थी।
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: लिखने वाले तो
मोहब्बत के नाम
चाँद तारे भी लिख देते है।
हम तो वो सितारे है
जो विज्ञापन भी
सुपर हिट देते है।
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: मोहब्बत में खोने वालो का
कोई तो पता होगा
दिल चिर के देखो
कुछ तो लिखा होगा
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: हो गतिरोध
पर नहीं विरोध
कवित्व बोध।
����������������
[4:58PM, 3/10/2016] लोकनाथ सेन: आशिकी में दिल तोड़ चुके है
तेरी गलियो से मुह मोड़ चुके है।
ऐ जालिम जिन्दा तो हम आज भी है
बस जिंदादिली छोड़ चुके है।
✒अनपढ़

मंगलवार, 8 मार्च 2016

जीवन संघर्ष
चरण स्पर्श।
जीवन माया
नश्वर काया।
जीवन आश
होता उपहास।
जीवन भार
मन आभार।
जीवन जन
फैले कणकण।
जीवन जाल
जग जंजाल।
जीवन प्रहार
होते संहार।
जीवन अनंत
कई पंत।
जीवन भान
अनंत अभियान।
जीवन सागर
भरी गागर।
जीवन नाव
धुप और छाव।
जीवन भाव
नहीं ठहराव।
��लोकनाथ सेन

नारी के महिमा अपार हे,
तोर बिना सुन्ना,
घर संसार हे।

जीवन मरन में,
संग ते निभाये।
लइका सियान के,
मन के भाये।

नारी के महिमा,
अपार हे।
तोर बिना सुन्ना,
घर संसार हे।

नारी हमन ल,
जनम देवईया।
दुख सुख म हमर,
संग निभईया।

नारी के महिमा,
अपार हे।
तोर बिना सुन्ना,
घर संसार हे।

ज्ञान देवईया,
राह देखईया।
भला बुरा के
भेद बतईया।

नारी के महिमा,
अपार हे।
तोर बिना सुन्ना,
घर संसार हे।

लईका सियान ल
मया करईया।
सब्बों के दख ल,
पल हरईया।

अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो. 9977580623

सोमवार, 7 मार्च 2016

दुनिया जिसपर टिका हुआ है,
घर घर जिसपर टिका हुआ है।
क्यों है वो अबला कहलाती
बिन तेरी दुनिया अधूरी रह जाती।
माँ है तू, बेटी है तू, बीबी है तू
फिर क्यों दुनिया में अबला बन जाती।
नव सृजन की पहचान है तू
फिर क्यों तू अनजान बन जाती।
शक्ति जिसके बिन है अधूरी
फिर क्यों इतना दमन सह जाती।
तेरे बिन है कौन है जन्मा
तू ही तो है अगम अजन्मा।
माँ का रूप धर अमृत बरसाया
दुनिया में आया तूने पाला।
शिक्षा देकर प्रथम गुरु तू
तेरे नैनो से दुनिया को जाना।
प्यार कअ सागर बनी
पत्नी बन दुल्हन सजी।
बेटी घर की रानी थी
ससुराल में बेगानी थी।
ना था कोई अपना पराया
सबसे तूने प्यार बरसाया।
बहन बन बैठी डोली
छोड़ी सारी सखी सहेली।
दादी की लोरी की तान
बढ़ जाती मेरी भी शान।
दुनिया बिन तेरे सोचु तो
लूट जाती है मेरी आन।
��अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9144886001

ममता को समेटे
नारीत्व को लपेटे।
जमाना तुझको देखे
सहनशीलता लेके।
क्या है तेरी माया
सुंदरता की काया।
जग है तुझ में समाया
तूने सबको अपनाया।
आँशु तू बहाती है
हर दर्द सह जाती है।
संभव नहीं बिन सृजन
दुनिया हो जाये निर्जन।
दुखो तेरा समझ न पाता
तू सबका भाग्य विधाता।
देख तेरे आँखों में आँशु
मेरे दिल से बरसे रक्तांशु।
जीवन भर मैंने दूध पिया है
हर पल तेरे सायें में जिया है।
कर्ज तेरा मेरे जीवन पर,
ऋणी रहूँगा मैं जीवन भर।
��अनपढ़
मो 9977580623

ज्ञान बांटती
सुख दुःख छाटती
पेट काटती।

दुःख सहती
कुछ न कहती।
सब सहती।

आंसू है भरे
जग का भार धरे
मातृत्व चले।

अपनेपन
रूठते है सजन
अर्पित मन।

दुःख की नैया
काँटों जीवन सैंया
जग खेवैया।

है नारायण
जग से परायण
कैसा कारण।

��अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623

जो आग लगी है सीने में
क्या रख्खा है अब जीने में।
टुकड़ो में है कोई तोड़ चला
मैं अपने सांसो को छोड़ चला।
रुका हुआ जो पानी था
रगो में बहता पेशानी था।
छोड़ने वाले छोड़ गए
तोड़ने वाले तोड़ गए।
चुप बैठा हूँ मैं भी अबतक
जिन्दा बचा हूँ मैं जब तक।
मुझे इंतजार है किस बात की
मेरे अपनों के बुरे हालात की।
ऐसे में एक दिन आएगा
कोई अपना बच न पायेगा।
देश को छलनी करने वाला
मेरे घर में छल कर जायेगा।
लुटता अस्मत गैरो का कब
मेरा अपना लूटा जायेगा।
जा की कीमत ना औरो की
अपनों की जा जब जायेगी।
घर में लगते आग औरो का
मेरा घर भी झुलसा जायेगी।
ठंडी सांसे भरने वाला मैं
तब खून उबल ना पायेगी।
औरो की खबर पढ़ने वाला मैं
तब मेरी खबर छप जायेगी।
��अनपढ़
लोकनाथ सेन
9144886001

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

सोच जमाने की बदल सकता नहीं।
कदम बढे उसे रोक सकता नहीं।
कहने वाले कहते रहते है
उन्हें मैं टोक सकता नहीं।
जिंदगी मेरी एक संघर्ष है
आराम मैं कर सकता नहीं।
लोग भगवान में कमी खोज लेते है
मैं उनकी बातों से अटक सकता नहीं।
जमाने में तौहीन होतीं है हरकिसी की
ऐसे तौहीनो से अब मैं डरता नहीं ।
दर्द और तकलीफ के राह पर चला हूँ
दर्द का डर होता तो मैं चलता नहीं।
कहने वाले को कौन रोक पाया है
इसलिए मैं भी कुछ कहता नहीं।
जमाने में बदलना है बहुत कुछ
इसलिए मैं बैठकर रहता नहीं।
सहने वाले को जमाना ठोकरे मारता है
इसलिए अब मैं चुपचाप संहता नहीं।
��अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623

गुरुवार, 3 मार्च 2016

भारत के गद्दारो को
घर घर को लूटने वालो को।
देश का हीरो बना रहे हो
शान देश की गिरा रहे हो।
व्यक्ति से व्यक्ति है टुटा
देश ने तुम्हारा क्या है लूटा।
बदला लेना है मैदा में आओ
छुपछुप के तुम कायर कहलाओ।
देख जमाना भी हस्ता है
इंतजार में हर पुत्र रहता है।
जिस दिन नजर में आवोगे
कायर बच न पाओगे।
अपनेपन का ढाल बनाया
अपनों को रक्त से नहलाया।
चैन की नींद सोने वालों
अशांति के बिज बोने वालो।
कब तुम खैर मनाओगे,
सामने आवोगे तो सीने में गोली खाओगे।
��अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623