जो आग लगी है सीने में
क्या रख्खा है अब जीने में।
टुकड़ो में है कोई तोड़ चला
मैं अपने सांसो को छोड़ चला।
रुका हुआ जो पानी था
रगो में बहता पेशानी था।
छोड़ने वाले छोड़ गए
तोड़ने वाले तोड़ गए।
चुप बैठा हूँ मैं भी अबतक
जिन्दा बचा हूँ मैं जब तक।
मुझे इंतजार है किस बात की
मेरे अपनों के बुरे हालात की।
ऐसे में एक दिन आएगा
कोई अपना बच न पायेगा।
देश को छलनी करने वाला
मेरे घर में छल कर जायेगा।
लुटता अस्मत गैरो का कब
मेरा अपना लूटा जायेगा।
जा की कीमत ना औरो की
अपनों की जा जब जायेगी।
घर में लगते आग औरो का
मेरा घर भी झुलसा जायेगी।
ठंडी सांसे भरने वाला मैं
तब खून उबल ना पायेगी।
औरो की खबर पढ़ने वाला मैं
तब मेरी खबर छप जायेगी।
अनपढ़
लोकनाथ सेन
9144886001
ब्लॉग आर्काइव
सोमवार, 7 मार्च 2016
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