ज्ञान बांटती
सुख दुःख छाटती
पेट काटती।
दुःख सहती
कुछ न कहती।
सब सहती।
आंसू है भरे
जग का भार धरे
मातृत्व चले।
अपनेपन
रूठते है सजन
अर्पित मन।
दुःख की नैया
काँटों जीवन सैंया
जग खेवैया।
है नारायण
जग से परायण
कैसा कारण।
अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623

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