ब्लॉग आर्काइव

सोमवार, 7 मार्च 2016

ज्ञान बांटती
सुख दुःख छाटती
पेट काटती।

दुःख सहती
कुछ न कहती।
सब सहती।

आंसू है भरे
जग का भार धरे
मातृत्व चले।

अपनेपन
रूठते है सजन
अर्पित मन।

दुःख की नैया
काँटों जीवन सैंया
जग खेवैया।

है नारायण
जग से परायण
कैसा कारण।

��अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623

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