ऐसे टूट के बिखरी है जिंदगी
अब सिमटने का मन करता है।
टूट के पत्थर भी मिटटी बन जाती है,
अब मिटटी से लिपटने का मन करता है।
शुभरात्रि
भागदौड़ है जिंदगी,
कही नहीं ठहराव ।
धुप ही धुप फैला हुआ,
मिलत नहीं है छाव।
आँखे अब नम हो चली,
सावन की है आस।
बून्द बून्द है बही,
हर बून्द है खास।
ले शपथ हम जीवन में
एक दीप है जलाना।
पिछडे हुए लोगो को
हमें साथ में है लाना।
अँधेरा चहुओर है फैला
उजियारा है फैलाना।
अशिक्षा भ्रष्टाचार
बढ़ रहा है प्रतिदिन।
शिक्षा और सुरक्षा का
जग में भाव है बहाना।
कुंठित मन, शापित तन
ले कर चलने वालो को
नए समाज नई दिशा
लेकर हमको है चलना।
मेरा तेरा बहुत हुआ अब
हम को है कदम मिलाना।
नर नारी से युग है जन्मा
कन्धा मिलाकर है चलना।
कोई नहीं अब भेद भाव हो
ऐसा हमें निति अपनाना है।
जगतगुरु फिर बन जाये हम
ऐसी निति है अब अपनाना।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
मो 9977580623
वाट्सअप 9144886001
ना जाने क्या रखा है जीवन में
इस खोखले हाड़ मास तन में।
अस्पतालों के इर्द गिर्द कटती
उम्र अब गरीबी में है सिमटती।
धन के बिन व्यक्ति निर्धन है
शहर अब सीमेंट का वन है।
बीमारियो का अम्बार लगा
दवाइयो से हर घर है पटा।
किसी को बीमारी है जब आती
डॉक्टर की लॉटरी लग जाती
कौन है अपना कौन पराया
ये कोई भी पहचान न पाते।
बीमारी का नाम न जान पाते
रोज है नए नए टेस्ट बताते।
आईसीयू, ओटीयु, आईटीयू
न मुझको समझ आये तू।
लूट मची है जगह जगह अब
ना जाने प्राण छूट जाये कब।
टूट चूका है सब रिश्ता नाता
केवल पैसे को अपना माना।
निर्धन का यहाँ कोई न है मोल
धनवान बना है अब अनमोल।
पैसा है तो जो चाहे जल्दी बोल।
जिंदगी अब पैसे से बिकती है
बिन पैसे के धुप में सिकती है।
क्या लिखते ये समझ न आते
भाव जिंदगी रोज बिक जाते।
देख मेरा भी दिल अब बोला
क्यों मैंने जग में आँखे खोला।
अनपढ़ शब्द लेकर चलता हूँ
पर अनपढ़ मैं बन न पाया हूँ।
जनम लिया हूँ इस धरती पर
यह सोचकर हर पल तड़पा हूँ।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
बलौदा बाजार
मो 9977580623
व्हाट्सअप 9144886001
वेतन आवत हे
आवत हे
फेर कोन
कोती जावत हे
बाबू अउ
अधिकारी
गदागद
कमावत हे।
आबंटन के
फेर हे
अधिकारी
मन ढेर हे।
अपन वेतन
बर नई ये चिंता
आबंटन ढेर हे।
शिक्षाकर्मी
मन पाप कर
डरे हे।
जित्ते जी
मरे हे
पैसा के होंगे
अकाल
शिक्षाकर्मी बर
भरे बरसात में दुकाल।
अधिकारी मन के
कइसन कमाल
वेतन के नाव ले
होवत हे धमाल।
शिक्षाकर्मी करत
हे हड़ताल।
शासन नई हे
परेसान।
यहाँ गर्मी म
हड़ताल होवत हे
जम्मो शिक्षाकर्मी
मुड़ धरके रोवत हे।
अधिकारी अउ
नेतामन
ऎसी अउ कूलर
मा सोवत हे।
✒अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
(चोराहु झन जी अभिच्चे लिखे हवा)