ना जाने क्या रखा है जीवन में
इस खोखले हाड़ मास तन में।
अस्पतालों के इर्द गिर्द कटती
उम्र अब गरीबी में है सिमटती।
धन के बिन व्यक्ति निर्धन है
शहर अब सीमेंट का वन है।
बीमारियो का अम्बार लगा
दवाइयो से हर घर है पटा।
किसी को बीमारी है जब आती
डॉक्टर की लॉटरी लग जाती
कौन है अपना कौन पराया
ये कोई भी पहचान न पाते।
बीमारी का नाम न जान पाते
रोज है नए नए टेस्ट बताते।
आईसीयू, ओटीयु, आईटीयू
न मुझको समझ आये तू।
लूट मची है जगह जगह अब
ना जाने प्राण छूट जाये कब।
टूट चूका है सब रिश्ता नाता
केवल पैसे को अपना माना।
निर्धन का यहाँ कोई न है मोल
धनवान बना है अब अनमोल।
पैसा है तो जो चाहे जल्दी बोल।
जिंदगी अब पैसे से बिकती है
बिन पैसे के धुप में सिकती है।
क्या लिखते ये समझ न आते
भाव जिंदगी रोज बिक जाते।
देख मेरा भी दिल अब बोला
क्यों मैंने जग में आँखे खोला।
अनपढ़ शब्द लेकर चलता हूँ
पर अनपढ़ मैं बन न पाया हूँ।
जनम लिया हूँ इस धरती पर
यह सोचकर हर पल तड़पा हूँ।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
बलौदा बाजार
मो 9977580623
व्हाट्सअप 9144886001
ब्लॉग आर्काइव
शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016
**)अनपढ़ अस्पताल(**
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें