ब्लॉग आर्काइव

रविवार, 17 अप्रैल 2016

अनपढ़ दोहा 01+02

भागदौड़ है जिंदगी,
कही नहीं ठहराव ।
धुप ही धुप फैला हुआ,
मिलत नहीं है छाव।

आँखे अब नम हो चली,
सावन की है आस।
बून्द बून्द है बही,
हर बून्द है खास।

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