ब्लॉग आर्काइव

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

वेतन आवत हे
आवत हे
फेर कोन
कोती जावत हे
बाबू अउ
अधिकारी
गदागद
कमावत हे।
आबंटन के
फेर हे
अधिकारी
मन ढेर हे।
अपन वेतन
बर नई ये चिंता
आबंटन ढेर हे।
शिक्षाकर्मी
मन पाप कर
डरे हे।
जित्ते जी
मरे हे
पैसा के होंगे
अकाल
शिक्षाकर्मी बर
भरे बरसात में दुकाल।
अधिकारी मन के
कइसन कमाल
वेतन के नाव ले
होवत हे धमाल।
शिक्षाकर्मी करत
हे हड़ताल।
शासन नई हे
परेसान।
यहाँ गर्मी म
हड़ताल होवत हे
जम्मो शिक्षाकर्मी
मुड़ धरके रोवत हे।
अधिकारी अउ
नेतामन
ऎसी अउ कूलर
मा सोवत हे।
✒अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
(चोराहु झन जी अभिच्चे लिखे हवा)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें