शब्दो का साथ है छूटा
लगता जैसे जग है रूठा।
कोशिश करता कुछ बन जाये,
काश मेरे शब्द ही तन जाए।
इच्छा मैंने पाला लिखने की,
किताब के कोने में दिखने की।
*अनपढ़
लोकनाथ सेन ''अनपढ़'' (Mo 9977580623)
दिल की बात
ब्लॉग आर्काइव
रविवार, 5 नवंबर 2017
मंगलवार, 5 जुलाई 2016
बदलते बादल की बहार आई है
फिर से सावन झूम इस बार आई है।
उमड़ घुमड़ कर बादल बरसा
सभी दिशा नव हरयाली परसा।
वन उपवन में नन्हे पौध उगे है
प्रकृति मन में नए अरमान जगे है।
किट पतंगे चहु ओर उड़ रहे है
नीर नित नए नए धाराये जुड़ रहे है।
उमड़ घुमड़ रही काली बदरा
चहु ओर खेतो में फैली अकरा।
उम्मीदों की नई फसल लगी है
चहु ओर देखो हरियाली सजी है।
घर में सज रहे है बैल और हल
खेतो में बरसा बरस जाये जो कल।
ले उम्मीदों की अब नयी फसल
मिट्टी को रहा हाथो से मसल।
उत्तम बीज और खाद तलासे
मिट्टी और पत्थर खेतो में तरासे।
धरती को चीर हम बीज लगाये
माँ के आँचल में सोना उगाये।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
सहायक शिक्षक पं
बलौदाबाजार
9144886001
शनिवार, 4 जून 2016
nai samaj
यकिन मानियें यदि ऐसा हो पाया जो सभी फिरकायें स्वयं सामने आकर सर्वनाई समाज को स्वीकार करेंगी और जो विरोधाभाषा वे दुर हो जायेंगी। फिरकाओं के बीच जो दिवाल खड़ी है वो दुर होगी एक एकाएक होने वाली या एक नियम बनाकर लक्ष्य पाने वाली बात नहीं अपितु बहुत लम्बी प्रकृया है जिसको सतत निरंतर आगे बढ़ते हुए प्राप्त करना होगा।
शनिवार, 28 मई 2016
हर बात दिल की
मैं कहना चाहता हूँ।
जज्बात दिल की
मैं कहना चाहता हूँ।
न समझ सके तुम
समझाना चाहता हूँ।
जो भूल गयी हो तुम
याद दिलाना चाहता हूँ।
मैं उन दिनों की यादें
याद कराना चाहता हूँ।
कुछ भूली बिसरी बातो
फिर से दोहराना चाहता हूँ।
उन कसमो उन यादो को
मैं निभाना चाहता हूँ।
तेरे एहसास को फिर से
मैं महसूस करना चाहता हूँ।
जो नम है तेरी आँखे
उन्हें पोछना चाहता हूँ।
झील सी तेरी आँखों में
मैं डूबना चाहता हूँ।
उलझे हुए बालो को
मैं सवारना चाहता हूँ।
उड़ते हुए केशुओ को
मैं बंदी बनाना चाहता हूँ।
उन यादो को उन बातो को
मैं फिर से जीना चाहता हूँ।
जो छुट गया था कल में
उसे मैं फिर से पाना चाहता हूँ।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
बलौदा बाजार
मो 9977580623
बहु आखिर बेटी क्यो नही
अनपढ़ मैं बैठा
न कर पाउ कोई बात।
पढ़े लिखो की दुनिया में
मेरी क्या है औकात।
माँ बाप जहां
अब अपने नहीं होते।
सास ससुर की
पूजा होती दिन रात।
ब्याह हुयी
बेटी चली ससुराल।
बहु बानी पर
सम्हली नहीं परिवार।
गलती किसी
कोई न जान पाया।
ननद की शादी
ससुराल उसको न भाया।
आये दिन बेटी
मायके दर्शन दें आता।
सास की लाडली
अब भी याद है आती।
बहु आयी घर
पर वो मन को न भाँति।
बहु बनकर आई
पर वो भी भूल न पायी।
माँ बाप की लाड़ली
ससुराल को समझ न पायी।
पति बेचार
हो गया बेगाना।
किसका दे साथ
उसको समझ न आना।
चुपचाप है आना
नहा खाकर निकलजाना।
बैठ तमासा
देख रहा है।
ससुर भी रोटी
सेक रहा है।
बीवी के
डर से बेचारा।
सबकुछ देखकर भी
आँखे मिंज रहा है।
बिखरा घर है
बिखरा है आँगन
न होता अब है
किसी का भी जतन।
न बहु बहु ही
बन पाती है।
न सास को वो
फूटे आँख
सहाति है।
अब तो पूरी
दुनिया ही मुझे
दोषी नजर आती है।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
बलौदाबाजार
मो 9977580623
