ब्लॉग आर्काइव

रविवार, 5 नवंबर 2017

शब्दो का साथ है छूटा
लगता जैसे जग है रूठा।
कोशिश करता कुछ बन जाये,
काश मेरे शब्द ही तन जाए।
इच्छा मैंने पाला लिखने की,
किताब के कोने में दिखने की।
*अनपढ़

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

बदलते बादल की बहार आई है
फिर से सावन झूम इस बार आई है।
उमड़ घुमड़ कर बादल बरसा
सभी दिशा नव हरयाली परसा।
वन उपवन में नन्हे पौध उगे है
प्रकृति मन में नए अरमान जगे है।
किट पतंगे चहु ओर उड़ रहे है
नीर नित नए नए धाराये जुड़ रहे है।
उमड़ घुमड़ रही काली बदरा
चहु ओर खेतो में फैली अकरा।
उम्मीदों की नई फसल लगी है
चहु ओर देखो हरियाली सजी है।
घर में सज रहे है बैल और हल
खेतो में बरसा बरस जाये जो कल।
ले उम्मीदों की अब नयी फसल
मिट्टी को रहा हाथो से मसल।
उत्तम बीज और खाद तलासे
मिट्टी और पत्थर खेतो में तरासे।
धरती को चीर हम बीज लगाये
माँ के आँचल में सोना उगाये।

✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
सहायक शिक्षक पं
बलौदाबाजार
9144886001

शनिवार, 4 जून 2016

nai samaj

समाज को मैं एक पेड़ के समान देखता हूँ इसके तीन महत्वपूर्ण हिस्सा है जड़, तना और उपरी हिस्सा (टहनीया, पत्ते, फल आदि) जड़ पेड़ को मजबुती प्रदान करता है तो तना जड़ और पेड़ के उपरी हिस्सा को जोड़ने वाला माध्यम है और उपरी हिस्सा उस पेड़ की विशालता विस्तृत स्वरूप उसके लाभकारी उत्पदकता को दर्शाता है। उसी प्रकार से समाज में आज फिरका, सर्व नाई समाज और फिरका$सर्वनाई समाज पदाधिकारी है। जिस प्रकार से हमारा देश विभिन्न जाति और धर्म में बंटा हुआ है फिर भी हमारी मूल पहचान है कि हम भारतीय है। वैसे ही हमारा समाज विभिन्न फिरकाओं में बंटा है जिनका अलग अस्तित्व है और हमारा मूल पहचान है कि हम नाई है। परम्परा और आधुनिकता दो अलग अलग और विपरित होते हुए भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखता है और दोनों मानव जीवन के आज महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसी भांति फिरका हमारे परम्परा हमारे संस्कार को दर्शाता है जिसमें हर फिरका का अलग रिती रिवाज और मान्यताएं है, तो सर्व नाई समाज इन फिरकाओं में बटे परिवार का एक वृदह स्वरूप है। जिसमें ये समस्त फिरकाओं को ससम्मान सम्मिलित करने का प्रयास हम सबको करना होगा। साथ ही फिरकाओं के पदाधिकारी, सर्व नाई समाज के पदाधिकारी और समाज के बुद्धिजीवी वर्ग इस पेड़ के तने के समान है जो फिरका और सर्व सेन समाज के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। फिरका का अस्तित्व इतना आसानी से समाप्त नहीं हो सकता जितना आज सोंचा जाता है। अब सोंचें फिरका के समाजिक संगठन के रहते सर्व नाई समाज की आवश्यकता क्यों आन पड़ी तो यही समस्त सवालों के जवाब छीपे हुए है, कुछ कमियां उन्हें हम ऐसे इंिगत कर सकते है। जैसे रोटी बेटी का लेन देन, फिरकाओं की अलग अलग मान्यतायें, एक दुसरे के प्रति नजरिया, आपसी सामंजस्य और भाई चारा, व्यापारिक दृष्टकोण से सहभागिता आदि ये सब वे महत्वपूर्ण कारण माने जा सकते हैं जिनके कारण फिरकायें एक दुसरे के आमने सामने खड़ी हो जाती है इन्हीं कमियों और समस्याओं के सामाधान के लिए और जिस प्रकार से आज समस्त धर्म के लोग आखिर में भारतीय है उसी प्रकार से सभी फिरका के लोग आखीर में सेन ही है। इस विचारधारा के विकास के लिए सर्व नाई समाज की आवश्यकता नजर आती है। फिरकायें नदियों के समान है और सर्व नाई समाज वह सागर है जिसमें सभी नदियां आकर समाहित हो जाती है अतः बिन नदियों के सागर की कल्पना नहीं किया जा सकता है। यदि सर्व नाई समाज फिरकाओं के विरूद्ध आकर खड़ा होता है तो मेरे विचार से यह उचित न होकर आपसी मनमूटाव को जन्म देखा, हमें सभी फिरकाओं को साथ लेकर उनको ससम्मान सर्वनाई समाज में उपयुक्त स्थान देना होगा, फिरकाओं में व्याप्त कमियों को उनसे चर्चा कर उनका साथ लेकर दुर करना होगा। तब जाकर हम  सर्व नाई समाज की सही प्रकार की स्थापना कर पायेंगें। जिस प्रकार एक महाजनपद विभिन्न जनपदों में बंटा हुआ होता है उसी प्रकार से सर्वनाई समाज विभिन्न फिरकाओं में बंटा हुआ है जिनकी कमियों को दुर करते हुए उनका स्वतंत्र अस्तित्व बनायें रखते हुए सर्वनाई समाज की स्थापना करना होगा। हर फिरके की कुछ खासियत है उन खासियत और अच्छाईयों को उभारना होगा उनको अन्य फिरकाओं को भी सिखाना होगा जिससे समस्त नाई समाज सुदृढ़ हो सके। समाज को परस्पर एक दुसरे के सहयोग और सामंजस्य से चलाना होगा भाई चारा, सहयोग की भावना और रोटी बेटी का रिस्ता हो। समाज को एक करने की आवश्यकता नहीं रहेगी वो खुद ब खुद एक हो जायेगा।
यकिन मानियें यदि ऐसा हो पाया जो सभी फिरकायें स्वयं सामने आकर सर्वनाई समाज को स्वीकार करेंगी और जो विरोधाभाषा वे दुर हो जायेंगी। फिरकाओं के बीच जो दिवाल खड़ी है वो दुर होगी एक एकाएक होने वाली या एक नियम बनाकर लक्ष्य पाने वाली बात नहीं अपितु बहुत लम्बी प्रकृया है जिसको सतत निरंतर आगे बढ़ते हुए प्राप्त करना होगा।

शनिवार, 28 मई 2016

हर बात दिल की
मैं कहना चाहता हूँ।
जज्बात दिल की
मैं कहना चाहता हूँ।
न समझ सके तुम
समझाना चाहता हूँ।
जो भूल गयी हो तुम
याद दिलाना चाहता हूँ।
मैं उन दिनों की यादें
याद कराना चाहता हूँ।
कुछ भूली बिसरी बातो
फिर से दोहराना चाहता हूँ।
उन कसमो उन यादो को
मैं निभाना चाहता हूँ।
तेरे एहसास को फिर से
मैं महसूस करना चाहता हूँ।
जो नम है तेरी आँखे
उन्हें पोछना चाहता हूँ।
झील सी तेरी आँखों में
मैं डूबना चाहता हूँ।
उलझे हुए बालो को
मैं सवारना चाहता हूँ।
उड़ते हुए केशुओ को
मैं बंदी बनाना चाहता हूँ।
उन यादो को उन बातो को
मैं फिर से जीना चाहता हूँ।
जो छुट गया था कल में
उसे मैं फिर से पाना चाहता हूँ।
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✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
बलौदा बाजार
मो 9977580623

बहु आखिर बेटी क्यो नही

अनपढ़ मैं बैठा
न कर पाउ कोई बात।
पढ़े लिखो की दुनिया में
मेरी क्या है औकात।
माँ बाप जहां
अब अपने नहीं होते।
सास ससुर की
पूजा होती दिन रात।
ब्याह हुयी
बेटी चली ससुराल।
बहु बानी पर
सम्हली नहीं परिवार।
गलती किसी
कोई न जान पाया।
ननद की शादी
ससुराल उसको न भाया।
आये दिन बेटी
मायके दर्शन दें आता।
सास की लाडली
अब भी याद है आती।
बहु आयी घर
पर वो मन को न भाँति।
बहु बनकर आई
पर वो भी भूल न पायी।
माँ बाप की लाड़ली
ससुराल को समझ न पायी।
पति बेचार
हो गया बेगाना।
किसका दे साथ
उसको समझ न आना।
चुपचाप है आना
नहा खाकर निकलजाना।
बैठ तमासा
देख रहा है।
ससुर भी रोटी
सेक रहा है।
बीवी के
डर से बेचारा।
सबकुछ देखकर भी
आँखे मिंज रहा है।
बिखरा घर है
बिखरा है आँगन
न होता अब है
किसी का भी जतन।
न बहु बहु ही
बन पाती है।
न सास को वो
फूटे आँख
सहाति है।
अब तो पूरी
दुनिया ही मुझे
दोषी नजर आती है।
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✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
बलौदाबाजार
मो 9977580623

गुरुवार, 26 मई 2016

कभी बिता था बचपन
जिन गलियो में घूमते।
राजा तो नहीं थे हम
बस पेपर थे बांटते।
जिंदगी ने जो मुकाम
आज मुझे दे दिया है।
जो कुछ भी है पास
आपका ही दिया है।
न कल मैं कुछ था
न आज मैं कुछ हूँ।
जिंदगी के ठोकरों से
मैं आज भी खुस हूँ।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
बलौदाबाजार
मो 9977580623
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बुधवार, 11 मई 2016

कौड़ी की बात
बन जाती है खास
सुने जज्बात

घुमे जमाना
अपना न बनाना
जग बेगाना

रोक ले हमे
जहा में कोई नहीं
बेगाना सही

टुटा था दिल
तेरे दूर जाने से
आजमाने से

✒अनपढ़
लोकनाथ