ब्लॉग आर्काइव

रविवार, 5 नवंबर 2017

शब्दो का साथ है छूटा
लगता जैसे जग है रूठा।
कोशिश करता कुछ बन जाये,
काश मेरे शब्द ही तन जाए।
इच्छा मैंने पाला लिखने की,
किताब के कोने में दिखने की।
*अनपढ़

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