अनपढ़ मैं बैठा
न कर पाउ कोई बात।
पढ़े लिखो की दुनिया में
मेरी क्या है औकात।
माँ बाप जहां
अब अपने नहीं होते।
सास ससुर की
पूजा होती दिन रात।
ब्याह हुयी
बेटी चली ससुराल।
बहु बानी पर
सम्हली नहीं परिवार।
गलती किसी
कोई न जान पाया।
ननद की शादी
ससुराल उसको न भाया।
आये दिन बेटी
मायके दर्शन दें आता।
सास की लाडली
अब भी याद है आती।
बहु आयी घर
पर वो मन को न भाँति।
बहु बनकर आई
पर वो भी भूल न पायी।
माँ बाप की लाड़ली
ससुराल को समझ न पायी।
पति बेचार
हो गया बेगाना।
किसका दे साथ
उसको समझ न आना।
चुपचाप है आना
नहा खाकर निकलजाना।
बैठ तमासा
देख रहा है।
ससुर भी रोटी
सेक रहा है।
बीवी के
डर से बेचारा।
सबकुछ देखकर भी
आँखे मिंज रहा है।
बिखरा घर है
बिखरा है आँगन
न होता अब है
किसी का भी जतन।
न बहु बहु ही
बन पाती है।
न सास को वो
फूटे आँख
सहाति है।
अब तो पूरी
दुनिया ही मुझे
दोषी नजर आती है।
✒अनपढ़
लोकनाथ सेन
बलौदाबाजार
मो 9977580623
ब्लॉग आर्काइव
शनिवार, 28 मई 2016
बहु आखिर बेटी क्यो नही
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