एक बूंद पसीना
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मुड़ी कसकसावत हे
लकलक ले जनावत हे।
याहा घाम ला देख के
पथरा तको पिघल गे।
सुख्खा मुड़ी ले
पसीना निकल गे।
बंजर मुड़ी में
छरा छिटका पर गे।
जम्मो अंगरा हर
एक बून्द पसीना म मर गे।
चूंदी लहलहावत हे
मधुर गीत गावत हे।
पसीना ले तरबतर
होके नहावत हे।
मुड़ी के प्यास बुझागे
अंगरा बुता गे।
पसीना अपन आघू के
सफ़र म भुलागे।
चेथि के राँय राँय
एक बून्द पसीना
ले झपागे।
अइसन गुदगुदी
के झन पूछ मजा आगे।
कॉलर ला चिभोर दिस
गर्मी दांत निपोर दिस।
पसीना के महिमा
देख बड़ मजा आगे।
नूनछुर पसीना तको
शक्कर ले जादा मिठागे।
पसीना के गंगा बढ़िस
एहसास के नवा
इतिहास गढिस।
कपड़ा के भीतरी
धार जिहा बाढ़िस।
मोर मन मज़ा आगे
फेर मन नई माडहिस।
एक बूंद पसीना
गर्मी के बया भुला दिस।
मोर हाड़मास शारीरके
सुते अरमान ल जगदीस।
तपत भुईया के
प्यास बुझा दिस।
अंगरा अस जरत
मोर शारीर ल
गुदगुदा दिस।
✒अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
बलौदा बाजार
मो 9977580623
ब्लॉग आर्काइव
रविवार, 1 मई 2016
**एक बून्द पसीना**
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