ब्लॉग आर्काइव

रविवार, 1 मई 2016

*बेटियां*

दो दिन अपने घर को
छोड़कर मैं रह न पाउँगा।
जो मेरे अपने न हो उन्हें
मैं अपना कह न पाउँगा।
फिर क्यों बेटियां
नए संसार में जी लेती है।
अनजाने लोगो को
अपना कह लेती है।
अपना घर अपन द्वारा
छोड़ के वो जी लेती है।
विवाह के बाद बेटियां
एक नया जन्म ले लेती है।
जो बेटी थी, बहन थी
वो नए रिश्ते स्वीकार लेती है।
बेटी से बहु बनकर
जिम्मेदारियो से जी लेती है।
राजकुमारी राजदुलारी
पल में परायी हो जाती है।
पापा के गोद से निकलर
काँटों की राह पकड़ जी लेती है।
फूल सी नाजुक बेटी कैसे
पत्थर बन जी लेती है।
खून के एक बून्द से डरने वाली
कैसे खून के आँशु रो लेती है।
दूध रोटी में नखरे करने वाली
कैसे मिर्ची रूखी रोटी खा लेती है।
नाजुक पलंग पर सोने वाली
कैसे जमी की चटाई पर सो लेती है।
आखरी ब्याह के बाद बेटियां
कैसे एक नया जनम ले लेती हैं।
✒अनपढ़ कवि
लोकनाथ सेन
बलौदाबाजार
मो 9977580623

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