ब्लॉग आर्काइव

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

जिन्दगी की कस्मकस भरी राहें,
तड़पकर भरती है हरदम आहें।
क्यों भागदौड़ है जिन्दगी में,
इन्सानियत की बंदगी में।
मैं भी इन्सा तू भी इंसा,
फिर क्यों लोग होते हैरां।
एक जिन्दगी तेरी है,
एक जिन्दगी मेरी है।
बस कुछ ही तो है अंतर,
तेरा जीवन कुंए के अंदर,
मेरा जीवन खुला समंदर ।
जीवन के भागदौड़ में,
ठहरा हुआ समंदर।
इंसानों के इस भीड़
में न जाने कैसा है मंजर।
इंसान इंसान में इंसानियत
का तनीक है अंतर।
आखिर क्यों है ये फासले,
जरा रूक कर बैठ,
और आराम से सांस लें।
जीवन क्यों मिला है,
मिट्टी को क्यों रूप दिया है।
आखिर कोई तो होगा कारण,
न जीवन मिला अकारण।
वो लोग जो दरदर भटकते हैं,
चलती गाड़ीयों, ट्रेनों में लटकतें है।
आखीर क्या थी मजबूरी जो,
इस कदर खसीट रहें हैं।
जीवन मिला है एक बार,
जनम न होगा सौ बार,
जिन्दादिली से जी ले राहगीर,
जिन्दा तो रहता है मस्त फकीर।
न गम का षायां है,
न अपनों की माया है,
न कल की चिंता है
न आज की फिकर है,
जिस गली मोहल्ले में चल दिया,
सुखी रोटी से पेट भर लिया।
सोने चांदी की न अभिलाशा,
साधु बोलते अपनेपन की भाशा।
फिर क्यों इंसा इंसा को नोचता है,
अपनों की चमड़ी को खरोचता है।
केवल धन दौलत की सोंचता है।
दो पल की जिंदगी है मिली,
तन है चादर जो कई जगहों से सिली।
दुनिया में तु खुद पर न कर घमण्ड,
तु इतना भी नहीं है अक्लमंद।
अक्लमंदी का ये नमूना है,
अपनो से तुने छिना है।
इंसानियत तो षब्द बड़ा है,
तेरे अंदर क्या इंसान खड़ा है ?
इंसानियत की परिभाशा,
सबको है निराषा,
क्या लाया था उस जहां से,
ले जायेगा तु इस जहां से,
खाली हाथ निर्वस्त्र था आया,
इस जहां में सब कुछ है पाया,
जहां से जायेगा खाली हाथ,
न ले जायेगा कुछ भी साथ।
फिर काहें की कस्मकस है
सब चिज तो बस भस्म है।
मिट्टी की है काया,
रिस्ते नाते है माया,
जर जोरू है पराया,
जीवन ने भरमाया,
न सोंच क्या लाया।
इंसा जन्म में क्या ?
तू एक इंसा है बन पाया !


लोकनाथ सेन ‘‘अपनढ़‘‘
अमेरा, वि.ख.पलारी,
जिला-बलौदाबाजार (छ.ग.)
मो.नं. 9977580623

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