ब्लॉग आर्काइव

रविवार, 17 जनवरी 2016

पढ़ा लिखा जो होता है,
खुद में वो खोता है।
मनगढ़ हु अनपढ़ हूँ,
सबसे सिख रहा हूँ।
कविताओ के भव सागर
तैरते दिख रहा हूँ।
ज्ञान का मसाल नहीं,
अज्ञान ही पहचान सही।
मैं नहीं कोई साहित्यकार,
फिर भी रहा जग को ललकार।
एक छोटा सा कलमकार,
बुराइयो को मैं रहा धिक्कार।
मचा जग में है घमासान,
हर जगह दीखते है शमसान।
जनता करती त्राहि माम,
मानवता का काम तमाम ।
देख के मेरा मन भी रोता है,
दीन रात नहीं ये सोता है।
खुस हु कि मैं अनपढ़ हूँ,
कहने को तो मनगढ़ हूँ।
मैं जग की सेवा कर,
ध्यान नहीं है मेवा पर।
सीधा और सादा सही,
जीवन भर आधा सही।
अपने सुखकी कामना,
दुःख की गठरी न बांधना ।
किसी से नहीं हो सामान,
आशीष मिले यह कामना।

�� शुभ दोपहरिया��
✒ अनपढ़
लोकनाथ सेन
�� अमेरा, बलौदा बाजार
�� 9977580623
ब्लॉग
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